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________________ नवपद - वृत्तिःमू. देव. वृ. यशो ॥ १६ ॥ Jain Education In कमेणऽहं दिट्टिवापि ॥२॥ जिणपवयणगयणससी होही एसोति चिंतिउं गुरुणा । दिण्णा से पव्वज्जा विहिणा अन्नत्थ | नेऊण ॥ ३ ॥ एसो य महावीरतित्थंमि साहूणं सीसचोरियाववहारो पढमो पवत्तो, तओ थोत्रकालेणं चिय गहियदुविहसिक्खेण अहिज्जियाणि एक्कारस अंगाणि, जेत्तिओ य दिट्टिवाओ तोसलिपुत्ताणं सोऽवि गहिओ, तंमि य काले जुगप्पहाणा अज्जवइरा, ताणं दिट्टिवाओ बहुओ अस्थि, ते य तया पुरीए चिट्ठति, तओ तत्थ पढणत्थं साहुसहिओ वइरस्सामिसगासं पेसिओ अज्जरक्खिओ गुरू हैं, कमेण य पत्तो उज्जेणि, तत्थ दिट्ठा भद्रगुत्तथेरा, वंदिया सविणयं, साहिओ निययवत्तंतो, तेहि य- " तं धन्नोऽसि महायस ! तए विढत्ता सुनिम्मला कित्ती । जो एवं जिणदिक्खं गहिउं उज्जमसि सव्वत्थ ॥ १ ॥ " एवमाइ उबवूहिऊण भणिओ - जहाऽहमियाणिं संलि - हियसरीरो अणसणं काउकामो, न य मम कोइ निजामगो अत्थि, ता तुमं चेत्र मं निज्जामिऊण वच्चसु, तेणवि तहात्तिका उमन्भुवगयं, कालं करंतेहि य तेहिं समाइट्ठ - अज्जवइरेहिं समं मा एगाए वसहीए चिट्ठेज्ज, वीसुं ठिओ तेहिं अच्छित्ता पढिज्ज, जओ तेसिं समं जो सोवक्कमाउओ एगंपि रयाणं वसइ सो तेहिं समं कालं करेइ, तए य पत्रयणाहारेण होयव्वंति, तओ तमहं पडिसुणिऊण गएसु देवलोगं भद्दगुत्तेसु अज्जरक्खिओ गओ वइरसामिसयासं, For Private & Personal Use Only अभिनिवेशे गोष्ठामाहिलोदाहरणं ९ ॥ १६ ॥ w.jainelibrary.org
SR No.600105
Book TitleNavpad Prakaranam
Original Sutra AuthorYashovijay Upadhyay
Author
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1927
Total Pages710
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size14 MB
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