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रागा मुणिव्त्र वर्णपिंडिमिच्छंता ॥ ८० ॥ तो भक्खिऊण तं ते पत्ता गेहं चिलाइपुत्तोऽवि । तह वच्चतो पास झाणगयं मुणिवरं एकं ॥ ८१ ॥ तं भणइ अहो समणा !, संखेवेणं कहेसु मे धम्मं । अन्नह तुज्झवि सीसं छिन्दिरसामी अह | मिमंत्र ॥८२॥ पडिबुज्झिहिन्ति उवओगपुत्रयं जाणिऊण मुणिणावि । उवसमविवेगसंवर पयत्तयं साहियं तस्स ॥ ८३ ॥ तं सोऊणुव संतो गंतूण विवित्तभूमिभायंमि । सो चिंतिउं पयट्टो एयाण पयाण को अत्थो ? ॥ ८४ ॥ हुं नाथमुत्रसमो ताव एत्थ कोहस्स जो परिचाओ । उइयस्स विहलकरणेण अणुइयरसोद यनिरोह ||| ८५ ॥ जओ - " दुग्गइगमणे सउणो | सिवसग्गपहेसु किण्हसप्पोच्च । अत्तपरोभयसंतावदायगो दारुणो कोहो ||८६||" जावज्जीवं इण्हि होउ निवित्ती इमरस ता मज्झ । इय चिंतिऊण मुक्कं करवालं दाहिणकराओ ॥ ९० ॥ जोऽवि विवेओ मुणिणा, बीयाणमि मज्झ आइट्ठो । तस्सवि भावत्थो दव्वसयणवत्थाइपरिहारो ॥ ८८ ॥ जओ - “जत्तियमेते जीवो संजोगे चित्तवल्लहे कुणइ । तत्तियमेत्ते सो सोयकीलए नियमणे निहइ ॥ ८९ ॥ " एएऽवि परिच्चत्ता जावज्जीवाऍ ता मए इण्हि । इय चिंतिऊण सीसंपि छडियं चत्तमोहेणं ॥ ९० ॥ इंदियनोइंदियपसरभंजणे संवरोऽवि किर होइ । सोऽवि मए पडिवन्नो विमुक्कदेहेण एत्ताहे ॥ ९१ ॥ काठ रसग्गेण ठिओ एवं परिचिंतिऊण स महप्पा । मुणिवइउवएसायत्तसत्तहियसारसंमत्तो ॥ ९२ ॥ एत्थंतरंमि - सोणिय -
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