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________________ * भवपद नयरंमि खिइपइटे जियसत्त नाम आसि नरनाहो । सयलंतेउरसारा धाराणनामा य से देवी ॥ १॥ सो सम्यक्त्वोवृत्तिःमू.व. त्पाचित्रावृ. यशो. मंतिखित्तभारो तीऍ समं विसयसोक्खदुल्ललिओ । दोगुंदगुव्व देवो गयपि कालं न याणेइ ॥ २ ॥ तइया य तमि| तिपुत्रज्ञात ॥४९॥ नयरे निवप्सइ पुत्तो दियरस एकस्स । चोदसविज्जाठाणाण पारगो जन्नदेवो त्ति ॥३॥ पंडियमाणी थद्धो सुइवाई जाइगविओ सो य । दट्टण नयरमझे, साहुजणं खिंसई बहुहा ॥ ४ ॥ जिणसासणस्स गिण्हइ अवण्णवायं । नाच विविहभंगीहिं । भणइ य जणस्स पुरओ, सुइभावविवज्जिया एए ॥ ५ ॥ अह अन्नया कयाई समोसढो तत्थ बाहिरुज्जाणे । सुद्वियनामो सूरी, तस्सीसो सुबओ नामो ॥ ६ ॥ गोयरचरियपविट्ठो, सुणिउं धिज्जाइयस्स तं वत्तं । आगंतु गुरुपासे आलोएउं इमं भणइ ॥ ७ ॥ जइ तुब्भे अणुजाणह तोऽहं सक्खं समग्गलोयरस । गंतं रायसहाएऽवणेमि पंडिच्चगव्वं से॥ ८॥ तो भणइ गुरू अहं न जुत्तमेयं जओ इहऽम्हाणं । धम्मो खमापहाणो विरुज्झई सो विवाएणं ॥ ९॥ न य परिभवोऽवि एसो अक्कोसपरीप्तहस्ससहणाओ। न य अस्थि तत्थ सिद्धी, वायाओ जेण भणियं च ॥१०॥" वादांश्च प्रतिवादांश्च, वदन्तोऽनिश्चितांस्तथा । तत्त्वान्तं नैव गच्छन्ति, तिलपीलकवद्गतौ ॥११॥" एवं गुरुणा भाणए, सीसोऽपडिभणइ सुव्वइ १ ४९॥ Jain Education onlinal For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600105
Book TitleNavpad Prakaranam
Original Sutra AuthorYashovijay Upadhyay
Author
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1927
Total Pages710
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size14 MB
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