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________________ निराबाहं ॥ ८९ ॥ इय एवमाइधम्मं सोऊणं केऽवि भवविरत्तमणा । सव्वविरई पवन्ना अण्णे उण देसविरयंति, In ९० ॥ तइया य छट्टखमणाउ पारणटाएँ निग्गओ भिक्खं । नयरंमि परियडंतो गोयमसामी सुणइ क्त्तं cin ९१ ॥ सिवरायरिसी एवं अइसयणाणेण पासिउं भणइ । अरिंस लोए दीवा सत्त समुद्दा य सत्तेव ॥ ९२॥ तेण पर वोच्छिण्णा न संति दीवा व सागरा वावि । एवं सोउं गोयमसामी संकाउरो जाओ ॥ ९३ ॥ तो गहिय-। भत्तपाणो आगंतुणं विहीए भुजित्ता । परिसाए मझगयं सामि विणओणओ भणइ । ९४ ॥ जणं सिवरायरिसी दीवसमुदाण संखविसयंमि । लोयस्स पुरो जंपइ तं सच्चं अहव मिच्छन्ति ॥ ९५॥ सविसेसं उवउत्ता जाया एत्थतरंमि सा परिसा। चिंतइ य सुटू पुढे अम्हवि चित्तठ्ठियं एयं॥९६॥ एवं पुढो सामी पभणइ गंभीरमहरवायाए । सिवरायरिसी गोयम ! विभंगनाणी भणइ मिच्छा ॥ ९७ ॥ जंबुद्दीवाइया दीवा लवणाइया समुद्दा य । होति असंखा जम्हा दुगुणा दुगुणा। तिरियलोए ॥९८॥ तं सोउं परिसाए सिवरायरिसिस्स साहियं सव्वं । सोवि तहा कुणइ तहिं संकं कंखं विगिच्छं च ॥ ९९ ॥ मिच्छत्तस्सऽइयारे, वटुंतस्स य विभंगणाणं तं । परिवडियं नवि पेच्छइ किंचिवि दिट्टिप्पहाईयं ॥ १.०॥ तो चिंति पयत्तो पुव्वमहं सव्वमेव पासंतो। इण्हि किंपि न पासामि कारणं किंचि ता होजा Jain Education a l For Private & Personel Use Only |ww.jainelibrary.org
SR No.600105
Book TitleNavpad Prakaranam
Original Sutra AuthorYashovijay Upadhyay
Author
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1927
Total Pages710
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size14 MB
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