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________________ CAR उत्पादना दोषा: प्राभृतिका तथाऽध्यवपूरक उक्तलक्षणो 'अविशोधिरिति' अविशोधिकोटी-उद्धरणाचनहां, वि. धिकोटिर्भवेच्छेषा, श्रीपञ्चव. सपस्थाप औद्देशिकादिरूपा उद्धरणार्हेति गाथार्थः ॥ ५२ ॥ उक्ता उद्गमदोषाः, उत्पादनादोषानाहनावस्तु ३ त उप्पायण संपायण निवत्तणमो अ हुंति एगट्ठा । आहारम्मिह पगया तीऍ य दोसा इमे होंति ॥७५३॥ PI. 'उत्पादने ति उत्पादनमुत्पादना, एवं सम्पादना निवर्त्तना चेति भवन्त्येकार्था एते शब्दा इति, सा चाहारस्येह-अधि॥११८॥ कारे प्रकृता, तस्याश्चोत्पादनायाः सम्बन्धिनो दोषाः एते भवन्ति-वक्ष्यमाणलक्षणा इति गाथार्थः ॥ ५३॥ दूधाई दूइ निमित्ते आजीव वणिमगे तिगिच्छा य । कोहे माणे माया लोहे अ हवंति दस एए॥७५४॥ है पुद्धिं पच्छा संथव विजा मंते अ चुण्णजोगे अ । उप्पायणाएँ दोसा सोलसमे मूलकम्मे अ॥७५५॥ धाइत्तणं करेई पिंडत्थाए तहेव दूइत्तं । तीआइनिमित्तं वा कहेइ जायाइ वाऽऽजीवे ॥ ७५६ ॥ जो जस्स कोइ भत्तो वणेइ तं तप्पसंसणेणेव । आहारट्ठा कुणइ व मूढो सुहुमेअरतिगिच्छं ॥७५७ ॥ कोहप्फलसम्भावणपडुपण्णो होइ कोहपिंडो उ। गिहिणो कुणइऽभिमाणं मायाएँ दवावए तहय ॥ ७५८ ॥ अतिलोभा परिअडइ आहारट्ठा य संथवं दुविहं । कुणइ पउंजइ विजं मंतं चुण्णं च जोगं च ॥७५९ ॥ SANAAAAAAAAAAAAIANAS ॥११८॥ Jain Educati o nal For Private Personal Use Only mainelibrary.org
SR No.600102
Book TitlePanchvastuka Granth
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
Author
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1927
Total Pages630
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size13 MB
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