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________________ नन्दिसूत्रम् । 118011 Jain Education Inter मंत्र अने योग अपरिणतोनी आगळ प्रकाशित कराय ज नहीं. [आ वात नि. चू. पी. पृ. ३६ मां जणावी छे.] केवलं लोकसिद्धमपगासं मिसीहं, ज' अप्पगासधम्मं अन्न पि तं णिसीहूं । उदाहरणं- जहा लोइया रहस्सजुत्ता विज्जा मन्ता जोगा य अपरिणयाणं ण पगासिज्जंति " पृ. ३४ अर्थात् प्रकाश करवा योग्य ज न होय ते ' निशीथ ' कहेवाय छे. जेम रहस्ययुक्त एवी विद्या, मंत्र अने योग अपरिणतो माटे अप्रकाश्य होय छे, तेम निशीथसूत्र पण अपरिणत माटे अप्रकाश्य छे. आम खूद ग्रन्थकारो पण सुनिधर्मनुं पालन करनारा महातपस्वीओ पण जो परिणत न होय, गीतार्थ न होय तो एमने पण निशीथनुं प्रदान करवामां निषेध करे छे. जेओ जगतनो उपकार करवामां सदा उद्यमी हता, शासननी प्रभावना करवानी सुन्दर आवडतवाळा हता, जगतमां जैनधर्मनी सुवास फेलाववानी इच्छावाळा हता, भविष्यना लाभने विचारी शके तेवा बुद्धिवैभवने धारण करनारा हता. एमना करतां आपणे तो बधी वातोमां पछात छीए. भविष्यमां लाभ कइ रीते थशे ? तेनो पूरेपूरो विचार करवानी बुद्धि-शक्तिथी हीन छीए. माटे शास्त्रकारोनी आज्ञाने अनुसरवामां एकांत लाभ ज छे. आज्ञाबहारनो आपणी हुंकी दृष्टिनो महान् उद्यम गमे तेटलो होय छतां संसार वधारनारो छे. विभाग-४ प्रस्तुत नंदीसूत्र तेमज तेना पर उपलब्ध थता साहित्यनो इतिहास खूब चर्चास्पद छे, अने तेनी साथे अनेक इतिहासनो संबंध छे. तेथी समयना अभावे अन्य स्थळे ज ते विषयनी चर्चा करवानी भावना छे. अहीं मात्र तेने लगता अमारा वर्तमान निर्णयो ज जणाववामां आवशे. For Private & Personal Use Only प्रस्तावना | 118011 ww.jainelibrary.org
SR No.600097
Book TitleNandisutram
Original Sutra AuthorDevvachak
AuthorMalaygiri
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1969
Total Pages294
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_nandisutra
File Size14 MB
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