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________________ Jain Education अघदवौषघनाघनमण्डली, सुकृतसन्ततिकल्पलतावनी । विशदधर्मजनन्यमृतं स्फुरद्, गुणगणे करुणा जयताच्चिरम् ॥ ९ ॥ यतः - सर्वे धर्मा दानसत्यादयो ये, यन्मूलास्ते कीर्तिताः पूर्वपुम्भिः । एकैवेयं सा दया सावधानैः, साध्या सद्भिः सिद्धिसन्धानदूती ॥ ८१० ॥ यतः - द्यूतकारस्तलारक्षस्तैलिको मांसविक्रयी । वार्धकिर्नृपतिर्वैद्यः, कृपया सप्त वर्जिताः ॥ ११ ॥ तस्याग्रे चित्तरङ्गेण, किन्दार वादयन्पुनः । गातुं लग्नस्तदा योगी, स योगी वी ( गिवा) णिभाषया ॥ १२ ॥ साच - सोनारपुरिसइ काहुं किजइ रे, जइ नही दया प्रधान, तीनइ सोनइ सोह किसी रे, जीणइ त्रूटइ कान ॥ १३ ॥ दूहा- भारवहु काई जडे जनोई, दया विण धरम न कोई । जीवदया तुम्हे पालउ बाबू, हीयडइ निरमल होई ॥ १४ ॥ एभिर्वाक्यैर्धर्मदत्तो, विश्वस्तः प्राह हे विभो ! | ब्रूहि केन प्रकारेण, निष्पादयसि पुरुषम् ? ॥ १५ ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600090
Book TitleDharm Kalpadrum Nam Mahakavyam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdaydharm Gani
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year
Total Pages434
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size18 MB
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