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________________ सिरिसंतिनाहचरिए तोसभरनिब्भरो उडिउं बंदए, भत्त-पाणेण विविहेण परिछंदए । चारुनीईए पत्तेहिं भत्तीगओ, एसणिज्जेहिं कप्पेहिं करसंगओ ||८||७००५ || काय-मण- वायसुद्धीए संसुद्धओ, अत्तणोऽणुग्गहट्टाए न य मुद्धओ । एव ते साहुणो दो वि पडिलाभिउं, पत्तयाई तओ ताण संवाहिउं ॥ ९॥ ७००६ ॥ थोभूमि अणुव्व पुण बंदए, ताण साहूण पाए उ निदए । एइ हम्म वलिऊण भावंतओ, 'धन्नु संपुन्नु मह जम्मु गुणवंतओ ||१०||७००७ || जस्स में अज पारणगदिवसे वरं, पत्तदाणं इमं जाउ तोसायरं' । साविया बी तयं सुव्वया पेच्छिउं, पत्तदाणं इमं चित्ति अवयच्छिउं ॥ ११ ॥७००८ ॥ भावए "एस मह कंतु संपुन्नओ, देइ इह दाणु जो भत्तिसंपुण्णओ । पत्तरूवाण साहूण सुविसिटुयं जिणवरिदेहिं जह आगमे दिट्ठयं ||१२|| ७००९ ॥ अव किर एत्थ अह पि सकयत्थिया, जा य दिंतस्स अप्पेमि सई हत्थियां ” । एव तं दाणु तीए वि संपोसियं, जं विसुद्वेण चित्तेण संतोसियं ॥ १३ ॥ ७०१० ॥ एव दोन्हं पि देताण दाणं सया, सुद्धपत्तेसु निच्चं पि मोक्खासया । पालयंताण गिहिधम्मु सब्बुत्तमं धारयंताण तह दंसणं सत्तमं ॥ १४ ॥ ७०११ ॥ 5+5+5+5+5+5+50: रण्णो सूरपालस्स पुव्यभवत्ततं ८३६
SR No.600084
Book TitleSiri Santinaha Chariyam
Original Sutra AuthorDevchandasuri
AuthorDharmadhurandharsuri
PublisherB L Institute of Indology
Publication Year1996
Total Pages1016
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size17 MB
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