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________________ सिरिसंतिनाहचरिए मा होहिसि उब्बिग्गा सिग्धं एहामि तुज्झ पासम्मि । किंच मह हत्थगुत्थो वेणीदंडो न मोत्तव्यो ||४०||६८९१॥ कुप्पासओ वि एसो मए सहत्थेण परिहिओ तुज्झ । दिटुम्मि ममम्मि पुणो उत्तारेयव्बओ दइए !' ॥४१॥६८९२॥ इय जंपिऊण एसो सहत्थगुत्थं करेइ वरवेणिं । कुप्पासवं पि परिहेइ तीए नियएण हत्थेण ॥ ४२ ॥ ६८९३ ॥ एवं मंतेऊणं संभासेऊण पिययमं बहुसो । खग्गसहाओ गेहाओ निग्गओ जाइ एगदिसिं ॥४३॥६८९४ ॥ एसा वि पियम्मि गए हरिस-विसाएहिं पूरिया अहियं । खणमेकं अच्छित्ता लग्गइ निययम्मि कम्मम्मि ॥ ४४ ॥ ६८९५ ॥ जय पहायम्मि जान व पेच्छति सूरपालं ते । ता सीलमई पुच्छंति 'पुणसि किं पिययमं कहिं वि ? ' ॥ ४५ ॥ ६८९६॥ सा भइ 'न जाणामि मज्झ पसुत्ताए निग्गओ कहिं वि' । इय सोउं ते सव्वे गवेसणं तस्स कुव्वंति ॥४६॥६८९७॥ एवं च गवेसेत्ता जाव न लद्धं कहिं पि खोजं पि । ता विमण-दुम्मणा ते मिलिया गेहम्मि पिय- पुत्ता ॥४७॥६८९८ ॥ जंपति परोप्परयं 'किं सो मज्झाओ अम्ह केणाऽवि । भणिओ किंचि विरूवं, जेण गओ नीसरेऊणं ? ' ॥ ४८ ॥ ६८९९ ॥ तो पति पुणो विहु 'न अम्ह मज्झाओ केण वि कया वि । भणिओ मंगलवयणं जम्हा सो लहुयओ अम्ह ॥ ४९ ॥ ६९००॥ जइ न वि भजाए समं कहिंचि रुट्ठो भवेज एसो त्ति। ता पुणरवि पुच्छामो, मा कह वि हु अक्खए किंचि' ॥५०॥ ६९०१ ॥ तो पुणरवि सत्ता पुट्ठा एसा इमेहिं 'नणु भद्दे ! | कल्लं किंपि न जायं तुमए सह रूसणं तस्स ? ' ॥ ५१ ॥ ६९०२ ॥ सा भइ 'न मे किंचिवि कइयाइ वि रोसकारणं जायं। किंतु इमा रयणीए कया सहत्थेण मह वेणी ॥ ५२ ॥ ६९०३ ॥ रण्णो सूरपालस्स अक्खाणयं ८१८
SR No.600084
Book TitleSiri Santinaha Chariyam
Original Sutra AuthorDevchandasuri
AuthorDharmadhurandharsuri
PublisherB L Institute of Indology
Publication Year1996
Total Pages1016
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size17 MB
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