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________________ सच्चस्स अक्खाणयं सिरिसंति-ॐ तो भावणेण भणियं 'गंतव्य निच्छएण भाइ ! मए । अविसज्जिएण वि दढं' इय सोउं जंपए सच्चो ॥७६॥५७६५॥ नाहचरिए 'जइ एस णिच्छओ ता वच्च तुम किंतु एमि अहयं पि' । सो भणइ 'होउ एवं,' सामग्गि करिय तो चलिया ॥७७॥५७६६॥ * गभीरयनयराओ आरूढा पवहणे पहाणम्मि । अणुकूलवायवसओ सायरपारम्मि ते पत्ता ॥७८॥५७६७॥ तत्थ य ववहरिऊणं वलिया दटुण लाहमइगरुयं । आगच्छंताण तओ जलनिहिणो मज्झयारम्मि ॥७९॥५७६८॥ दटुण तत्थ किंची भणइ तओ भावणो जहा 'एसो । किं जं तेहिं न दिवो दीवो वणराइपरिहीणो ?' ॥८०॥५७६९॥ ५ तो जंपइ णिज्जामयपुरिसो जंह 'होइ एस नो दीवो । किंतु जलाओ उवरिं पइटिओ एस महमच्छो' ॥८१॥५७७०॥ तो भावणेण भणियं 'भुल्लो तं भद्द ! एस न हु मच्छो । ता दीवो चिय एसो, मा अन्नं किंपि कप्पेहि ॥८२॥५७७१॥ णिज्जामएण भणियं 'मच्छो चेवेस, होइ नो दीवो' । इयरेण वि पुण भणियं 'एत्तियमेत्तो ण मच्छो त्ति ॥८३॥५७७२॥ किं नो पेच्छसि भद्दय ! जेत्तियमेत्तम्मि पसरए दिट्ठी । तत्थ इमो चिय दीसइ, ता कह मीण इमं भणसि? ॥८४॥५७७३॥ ॐ जइ होइ कहवि मीणो तो घरवत्ताए होउ मह पणियं' । इयरेण वि पडिवन्न तव्वयणं 'होउ एवं' ति ॥८५॥५७७४॥ अह णिज्जामयपुरिसो गंतुं तस्सुवरि बालए अग्गि । तो अग्गितावतविओ झडत्ति मच्छो जले बुडो ॥८६॥५७७५॥ एवमिमं काऊणं अणुकूलयपवरवायजोगेण । पत्ता गंभीरयपट्टणम्मि खेमेण सव्वे वि ॥८७॥५७७६॥ १. भाय का० ।। २. जह एस होइ नो जे० का० ।। ३. एवमिई का जे०॥
SR No.600084
Book TitleSiri Santinaha Chariyam
Original Sutra AuthorDevchandasuri
AuthorDharmadhurandharsuri
PublisherB L Institute of Indology
Publication Year1996
Total Pages1016
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size17 MB
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