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________________ सिरिसंतिनाहचरिए 343030303030 कुमरो वि भायम्मि उद्वित्ता अडविसम्मुहं जाइ। पेच्छंतो नाणाविहतरुवरगणसंकुलं रण्णं ।। १०१ ।। ३९९२॥ अवि यअंब-कब - निंव- अंबोइय- जंबुय-सिंविसंकुलं, नाग-साग- पुन्नाग-सुगं-गय-पूगय-तगर आउलं । -ज-खुज-खजूरिय-खिजड-खंजपूरियं, खइर-बोरि-बड- खिरिणिय खारुयतरुसमूसियं ॥१०२॥३९९३ ॥ इय एरिसयं वर्णतरं बहुविहतरुवरभरनिरंतरं । जोवइ तत्थ भमंतउ हियइच्छिउ वररुक्ख समंतउ ॥१०३॥३९९४॥ एवं हिंडतेणं तेणं एत्थ गहणदेसम्मि । एगा वरदेउलिया सच्चविया सुटु रमणीया ॥ १०४ ॥ ३९९५ ॥ तस्स य वणस्स सामी, मज्झे तीसे पइट्टिओ देवो । सच्चविओ वरजक्खौ पच्चक्खो भत्तिमताण ॥ १०५ ॥ ३९९६ ॥ तीए देउलियाए जाव परिब्भमइ नाइदूरम्मि । ता पइसरइ सुगंधो गंधो से नासियारंधे ॥१०६॥३९९७॥ आघाइऊण गंध चिंतइ "सिरिचंदणस्सिमो गंधो। ता कत्तो ?, हुं नायं भवियव्वं चंदणदुमेण ॥ १०७ ॥ ३९९८ ॥ जम्हा सरिसो गंधो ता को सो होहिई इय तरूणं । एयस्स परिमलेणं जम्हा परिवासिया सव्वे ॥ १०८ ॥ ३९९९॥ नाय नायव्य विसहरचिंधेण विउसकहिएण" । इय चिंतिउं निरिक्खइ वणसंडं वच्छराओ त्ति ॥ १०९ ॥ ४०००॥ पेच्छइ य एगठाणे नाणाविहविसहरेहिं परियरियं । एगं महंतरुक्खं दीसंतं नयणरमणीयं ॥११०॥४००१ ॥ तं दट्टुणं एसो अइउत्तमसत्तसाहससमेओ । ते विसहरे फुरंते पुच्छे घेत्तूण पक्खिवइ ॥ १११ ॥४००२॥ 'वंतरवेणं' ति काउं सो न वि केणाऽवि छिंदिओ आसि । उक्कडसत्तत्तणओ छिंदइ साहेगदेसं सो ॥ ११२ ॥४००३॥ १. पहाय त्रु० || २. खेज्जड' जे० का० ॥ ३. पा० विना मूरियं जे० का० । 'मूहियं त्रु० ॥ सूरस्स रायस्स कहाणय ४७५
SR No.600084
Book TitleSiri Santinaha Chariyam
Original Sutra AuthorDevchandasuri
AuthorDharmadhurandharsuri
PublisherB L Institute of Indology
Publication Year1996
Total Pages1016
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size17 MB
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