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सिरिसंतिनाहचरिए
नरसिंघकुमरस्स कहाणयं
सियदंतु अहंतु अचंतबलवंतु, नामेण ससिकंतु परिभमइ विक्कंतु, इय तेण गइंदेण, कयकडमद्देण, विहिउ पुरिहिं हल्लोहलउ, नं सुरेण सुदुडेण, अइआरुट्टिण, आढत्तउ नयरिहिं पलउ ॥६॥२६१९॥ एत्थंतरे केण वि नरवरस्स, अक्खिज्जइ निवलच्छीहरस्स, जह 'देव एक्कु करि आउ एत्थु, एरावणु दीसइ नै महत्थु, इह सयल वि नयरी तेण देव, जगडिज्जइ वइरिनरिदि जेंव, पाडइ मढ-देउल खडहडंत, दवडेइ चउप्पय दडवडंत, छहुइ घय-तेल्लई घलहलंत, विक्खिरइ कवड्डय खलहलंत, वक्खरई विमद्दइ मसमसंत, भंजइ वणसंडई टसटसंत, मारइ जणु जो आसन्नपत्तु, एउ जाणवि करि जं तुज्झ जुत्तु,' त निसुणवि कोवफुरंतकाउ, सामंत विसज्जइ मणुयराउ, रि! लेहु लेहु सो दुटुहत्थि, उत्थल्ली इय राएण हत्थि',
१. गइंदिण का० ॥२. एत्तरि का० ।। ३. नरिंद जे०।। ४. उत्थल्लीयइ राएण हस्थि पा० । उत्थल्लिउ इय राएण हत्थु त्रुसं० । उत्थल्लीय राएण हत्थि का०।।