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सिरिसंति
नाहचरिए
जइ पुण तुम्हाण मए अवरद्धं किंपि तो खमह इण्हिं । आएसकारयजणे को कोवो कीरए सामि !? ॥१०४॥२४२९॥ विहु कहिंचि कुप्पंति सुपुरिसा तह वि झत्ति तूसंति । जम्हा एस सहावो न हु सुयणा होति बहुकोवा ॥१०५॥२४३०॥ जइ न वि मह पडिवयणं दाहिह तो दुक्खसय भरक्कतं । दाडिमफलं व हिययं फुंट्टिहिइ न एत्थ संदेहो ॥१०६॥२४३१ ॥ ता पिययम ! अत्ताणा सरणं विहीणा पिएहिं परिचत्ता। कह होहामि अहन्ना ? ता मह नाहत्तणं कुणह' ॥१०७॥२४३२॥ तं सोऊणं जक्खो जंपइ 'मा भद्द ! पत्तिएज्जाह । एयाए पावाए खाणीए कूडकवडाण ॥१०८॥२४३३॥ चालेउं अचएंती तेसिं चित्ताइं सा महाखुद्दा | चिंतइ “भेएण विणा न हु वसगा होंति मह एए" ॥१०९॥२४३४ ॥ एवं चित्ते काऊणं णिच्छ्यं वचणम्मि अइकुसला । भणइ 'जिणपालिओ मह आसि अणिडो सया कालं ॥। ११० ।। २४३५ ।। अहमवि एयस्स सयान हु भावंती तओ तुमं कीस। जिणरक्खिय ! चयसि ममं जो आसि सिणेहलो णिच्चं ? ।।१११ ।। २४३६ ॥
पिय आसि तुमं रुचण! चित्तम्मि बल्लहो अहियं । जिणपालियस्स उ पुणो वयणं उबरोहओ देती ॥ ११२ ॥ २४३७॥ तो अइणिग्घिण ! णिडुर ! कीस मरंतिं ममं उबेक्खेसि ? । जइ वि ण पत्तियसि तुमं, ता पेच्छसु देमि तुह सीसं ॥ ११३ ॥ २४३८॥ १० एएणं खग्गेणं तुह पुरओ रमण ! मा विगप्पेहि । जइ णवि किजइ एवं, ता नेहो कारिमो होइ ॥ ११४ ॥ २४३९ ॥
दाडिमफलं पा० । २. त्रु० विना फुट्टिही का० । फुट्टिहिई जे० पा० ॥ ३. बिहुणा का० ॥ ४. तो जे० ॥
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मायंदिदारयाणं कहाण
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