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मच्छोयरकहाणयं
सिरिसंति- जह पत्तो सत्थाहो, जह खित्तो कूवमज्झयारम्मि । जह चक्केसरि तुट्ठा, पायालपुरम्मि जह पत्तो ॥४५५॥१४८७॥ नाहचरिए जह दिहा वरकन्ना, तब्बयणेणं जहा हओ रक्खो। जह परिणीया कन्ना, जह पत्तो पुण वि कूवम्मि ॥४५६॥१४८८॥
जह उत्तिन्नो, जह पवहणम्मि चडिओ, जहा य जलहिम्मि। खित्तो य, जह य गिलिओ मच्छेणं जह इहं पत्तो॥४५७॥१४८९॥ सत्थाहचोइएणं जह डोंबेणं कओ कलंकिल्लो। जह णित्थिण्णो वसणाओ, जह य जित्तो तओ वणिओ॥४५८॥१४९०॥ जह बीयओ वि जित्तो,' इच्चाई साहियं असेसं पि । तं सोउं विम्हइओ सबालवुड्ढाउलो लोगो ॥४५९॥१४९१॥ जंपइ ‘अहह ! अहो ! हो ! अच्छरियं जं इमस्स वरचरियं' । इय जंपतो लोगो गओ य णियएसु ाणेसु ॥४६०॥१४९२॥ धणओ वि हु राएणं माणिज्जंतो उदार-वरभोए । भुंजइ तीए समाणं सईए सग्गे व्व सुरणासे ॥४६१॥१४९३॥
एवं सुहेण वचंतयम्मि कालम्मि नरवरिंदस्स । अह कमसो य कुमारो संपत्तो जोव्वणभरम्मि ॥४६२॥१४९४॥ * अन्नम्मि दिणे वरहत्थिखंधमारुहिय निग्गओ कुमरो । नियपरिवारसमग्गो जोयइ सोहं पुरवरस्स ॥४६३॥१४९५॥ एत्थंतरम्मि चडिया उभडलावण्णसालिणी कन्ना । सूरणरिंदस्स सुया चित्ते कुमरस्स सिरिसेणा ॥४६४।१४९६॥
। कुमरो वम्महभडबाणगोयरं पत्तो । पुच्छइ य तओ मित्ते 'कस्सेसा सोहणा कन्ना?' ॥४६५॥१४९७॥
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१. जिओ जे० का० ।। २. "लायण्ण त्रु० का० ।।