SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 277
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अणंतकालमुक्कोसं, इकं समयं जहण्णयं । अजीवाण य रूवीणं, अंतरेयं विआहिअं॥ १३८७॥ रूपिद्रव्याणाअनन्तकालमुत्कृष्टं, एकं समयं जघन्यकं, अजीवानां रूपिणां, अन्तरं विवक्षितक्षेत्रावस्थितेः प्रच्युतानां पुनस्तत्प्राप्तेय- मन्तरम् । वधानं, एतदुक्तरूपं व्याख्यातं, तेषां हि विवक्षितक्षेत्रावस्थितेः प्रच्युतानां कदाचित्समयावलिकादिसङ्ख्यातकालतोऽसङ्ख्यात| कालाद्वा पल्योपमादेर्यावदनन्तकालादपि सम्भवतीति ॥ १४ ॥ १३८७॥ . एतानेव भावत आह__वन्नओ गंधओ चेव, रसओ फासओ तहा। संठाणओ य विन्नेओ, परिणामो तेसि पंचहा ॥ १३८८ ॥ वन्नओ परिणया जे उ, पंचहा ते पकित्तिया। किण्हा नीला य लोहिया, हालिद्दा सुकिला तहा ॥१३८९॥ गंधओ * परिणया जे य, दुविहा ते वियाहिया। सुब्भिगंधपरिणामा, दुन्भिगंधा तहेव य ॥ १३९० ॥ रसओ परिणया* जे उ, पंचहा ते पकित्तिया। तित्त कडुयकसाया, अंबिला महुरा तहा ॥ १३९१ ॥ फासओ परिणया जे उ, अट्टहा ते पकित्तिया। कक्खडा मउया चेव, गुरुया लहुया तहा ॥ १३९२ ॥ सीया उण्हा य निद्धा य, तहा लुक्खा य आहिया । इति फासपरिणया एए, पुग्गला समुदाहिया ॥ १३९३ ॥ संठाणपरिणया जे उ, पंचहा ते पकित्तिया। परिमंडला य वटा य, तंसा चउरंसमायया ॥ १३९४ ॥ वण्णओ जे भवे किण्हे, भइए से उ गंधओ। रसओ फासओ चेव, भइए संठाणओवि य ॥ १३९५ ॥ वण्णओ जे भवे नीले, भइए०॥ १३९६ ॥ वण्णओ लोहिए जे उ, भइए॥१३९७ ॥ वण्णओ पीअए जे उ, भइए॥१३९८ ॥ वण्णओ सुकिले जे उ, JainEducati For Privale & Personal use only Xiainelibrary.org
SR No.600070
Book TitleUttaradhyayanani Uttararddha
Original Sutra AuthorChirantanacharya
AuthorKanchansagarsuri
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1889
Total Pages480
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript & agam_uttaradhyayan
File Size22 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy