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________________ अनुभूतें वल्कलचीरी श्रावकधर्म- भणिया-सुंदरि ! इथिविरहिए नूणं एस आसमपदे वडिओण याणति विसेस, ण से कुप्पियत्वं, तुरगे य भणति-किं इमे मिगा| पश्चाशक वाहिजंति ?, ततो रहिणा भणिओ-कुमार! एते एयमि चेव कजे उवजुजंति, ण एत्थ दोसो. तेणवि से दिण्णा मोदगा, सो चूर्णिः । भणति-पोयणासमवासीहि मे कुमारेहिं एतारिसाणि चेव फलाणि दिन्नपुवाणित्ति, बच्चताण य से एकचोरेण सह जुद्धं जायं, रहिणा गाढप्पहारो कओ, सिक्खागुणपरितोसिओ भणति-अस्थि विउलं धणं तं गेहसु सूरत्ति, तेहिं तीहिंवि जणेहि रहो भरिओ, ॥२५॥ कमेण पत्ता पोयणं, मोल्लं (समप्पिऊण) गहाय विसजिओ, उडयं मग्गसुत्ति, सो भमंतोगणियाघरे गंतूण भणइ ताय! अभिवाद यामि,देह इमेण मोल्लण उडयंति, गणियाए भणिओ दिजति, निवसत्ति,तीए कासवतो सद्दाविओ, ततो अणिच्छंतस्स कतं नहप. है रिकंमं, अवणीयवक्कलो य वत्थाभरणविभूसिओ गणियादारिया पाणिं गाहिओ व्हाविओ य,मा मे रिसिवेसं अवणेहित्ति जंपमाणो ताहि मण्णइ-जे उडगत्थी इहमागच्छंति तेसि एरिसो उवयारो कीरइ, ताओ य गणियाओ गात्रमाणीउ बहूबरं चिट्ठति, जो य RI कुमारविलोभणनिमित्तं रिसिवेसो जणो पेसिओ सो आगतो कहेति रण्णो-कुमारो अडवि अतिगतो, अम्हेहिं रिसिस्स भएण | न तिन्नो सद्दावेउं, ततो राया विसण्णमाणसो भणति-अहो अकजं, ण य पिउसमीवे जाओ ण य इहं, ण णज्जति किं पत्तो होहितित्ति चिंतापरो अच्छइ, सुणइ य सुमि गंधवसई, तं च से सुतिपहमणं जायं, भणति-मए दुक्खिए को मन्ने सुहितो गंधवेण रमतित्ति ? गणियाए पयट्ठिएण जणेण कहिय, सा आगता, पादपडिया रायाणं पसण्णचंदं विणवेति-देव ! नेमित्तिय संदेसो, जो तावसरूवो तरुणो गिहमागच्छेज्ज एयस्स वस्समयमेव दारियं दिजासिति, सो उत्तमपुरिसो, तं संसिता विउलसोक्खभागिणी होहितित्ति, सो य जहा मणिओ नेमित्तिणा अञ्ज मे गिहमागओ, तं च संदेसं पमाणं करेंतीए दिण्णा से मया पं० चू.३ ॥२५॥ Jain Education Monal For Private Personel Use Only www.jainelibrary.org ।
SR No.600057
Book TitleAdya Panchashaka Curni
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorYashodevsuri
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1952
Total Pages218
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size10 MB
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