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________________ ॐ454 KRISADSOMA न वि जाण जिएवर धम्म रम्म ॥२४॥ मसि श्रयसिफुल असिगुलीयवन्न, अश्टप्पर सुप्पयसरिसकन्न । अरुणग्गिनयण विकरालवेस, उनममुह जिनमी कविलकेस ॥ २५॥ चूचीजुयसन्निहफुकनास, घोम्यपुचोवम कुच्च तास । कुसिदंत सत्ततालुच्चदेह, गिरिकंदरसममुह उकगेह ॥१६॥श्कर जसु पत्थरसिखसमाण, लोढीकिरि अंगुखिसेणि जाण । अश्लंम्खड्डु पिट्टप्पएस, उपाय जासु पश्यविसेस ॥२७॥ ककिंमय उंदिरतणी माल, गलि पहिरी जेण महाकराल । कुंमलकियकन्निहिं नजल जेणि, फणहरगणि बङ्घीय जासु वेणि ॥२८॥श्य रकसरूव करेवि देव, बीहावर सावय कामदेव । रे धिक कुछ निग्गुण अणज, जर पोसह मिटिहसि नहीय अजा ॥ २ ॥ तन पिरिक तिरक मह खग्ग एह, तुह खंग खंग हलं करिसु देह । निसुणंत श्य तवयण 5०, न चल नियकाणह सो विसि ॥ ३० ॥ न दु मेरुमहीधर चला गण, न हु चुकर अरजुनतण बाण । मजाय न मिदहश जतहि जेम, नवि मुच्चइ धम्मिय फाण तेम ॥३१॥ करवासि करी तिणि किड खंग, जवसग्ग सहा ते अश्पयंम । वेयण अहियास चित्तसुधि, निच्चन आणेविण धम्मबुद्धि ॥ ३२॥ घात-नूममलि निवमिय देविहिं विनमिय कामदेव साहसपवरो । न गण नणु वेयण यण जेयण पुण नयि सुहकाएपरो॥ ३३ ॥ हिव जाणिय देविहिं हिनाणि, अझ वि सो वट्ट धम्मकाणि । ता किङाइ पुणरवि को उवाउ, जह नहा सावयधम्मजाउ ॥ ३४ ॥ अंजणपबय किरि मुत्तिमंत, गलगा करंतन अश्महंत । सुपयंग सुंभदमिहिं कराल, दंतूसल मूसखसम विसाल ॥ ३५ ॥ श्य हत्यिरूव किरि सुर कहर, हियम मवर अश्यण वहेश् । जा। उड्डुसि नदु त पञ्चखाण, सामाश्य पोसह धम्मकाण ॥ ३६॥ ता संप सुंमादमअग्गि, उमाविय वेगिहिं गयणमग्गि। 285 * Jain Education International For Private Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600046
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorKshemrajmuni
Author
PublisherJinshasan Aradhana Trust
Publication Year
Total Pages506
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size11 MB
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