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________________ JE अर्थ:-[घणकम्मपासबद्धो के०) निबिड कर्मरूप पासाए एटले गांव्योए बंधायेलो एवो [जीवो के०] जीव ३६ वैराग्य भाषांतर de जे ते (भवनयर के०) संसाररूप नगरना (चउप्पहेतु के०) चौटाने विषे. अर्थात् च्यार गतिरूप चौटाने विषे । 'शतकम् सहित memf (विविहाओ के०) अनेक प्रकारनी दुःखदाइ एवी (विडंबणाओ के०) विडंबनाने (पावइ के०) पामे छे. ए हेतु ।। २८॥ माटे [इच्छ के०] ए संसारने विषे (से के०) ते प्राणीने [को के०] कोण (सरणं के०) रक्षण करनार छ ? अर्थात कोइ पण नथी. ॥१६॥ भावार्थ:-हे प्राणिन् ! आ जीव घणां कर्मरूप पासबंधधी बन्धायेलो एवो सतो च्यार गतिरूप संसारना ३६ JE/चोगाना (चौटामां) अनेक प्रकारनी शरीरने तथा मनने दुःखदायक बन्धनादिरूप विटंबनाने पामे छे, खां तने ६ रक्षण करवा कोण समर्थ छ ? अर्थात् ते जीवनी रक्षा करनार धर्मविना बीजु कोइपण समर्थ नथी. ॥१६॥ घोरे गर्भवासे जठरद्रव्यसमूह एव जंबालः कर्दमस्तेनाशुचिबीभत्से घोमि गम्भवास । कलमलजंबालअसुइबीभच्छे । उषितः स्थितः अनतकृत्वोऽनतवारान् जीवः कर्मानुभावेन । वसिओ अणंतखुत्तो । जीवो कम्माणुभावेण ॥१७॥ अर्थ:-[जीवो के०] जीव जे ते (घोरंमि के०) घोर एटले भयानक एवो [कलमल के०] पेटमा रहेला www.jainelibrary.org Jain Education Inter 2010-05 For Private & Personal Use Only
SR No.600040
Book TitleVairagya Shataka
Original Sutra AuthorPurvacharya
AuthorGunvinay
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages176
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size9 MB
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