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________________ भाषांतर सहित ॥१०९॥ 1 का छे. जेम के, कोइक वखत देवताना वेश भजव्यो, लारें एवं विचार्य के, जगतमां महारा जेवो कोइ सुखीयो शतकम् नथी. तथा कोइक वखत नारकीनो वेश भजव्यो, त्यारे एवं विचायु के, जगत्मां महारा जेवो दुःखीयो नथी. तथा कोहक वखत तिर्यचनो वेष भजव्यो. त्यारे एवं विचार्य के. जगतमां महारा जेवू कोइने पराधीनपणानुं दुःख नथी. || ॥१०९॥ IN| वली कोइक वखत मनुष्यनो वेष भजव्यो, त्यारे ए विचार्यु के, जगत्मा कोइ महारा जेवो श्रेष्ठ बुद्धिवालो नथी. | एमज कोहक वखत पोताना पुद्गलना रुपनो अहंकार कयों के, महारा जेवो जगतमा कोइ रुपाळो नथी. तथा ज्यारे कुरूपवान् थयो, त्यारे एवं विचाय के, महारा जेवो जगतमा कोइ कुरूपवान् नथी. एम मांकडानी पेठे कोइ वखन सुखी थइने नाच्यो, अने कोइ वखत दुःखी थइने नाच्यो. माटे हे आत्मन् ! ए सर्वे वेशने असत्य जाणीने, फरीथी तेवा वेश धारण करवा पडे नहिं तेवो उद्यम कर. ॥ ५८॥ राजा इति च द्रमकोरंक इति च एषः श्वपाक इति एपः वेदवित् राउँत्ति ये दमगुत्ति च । एस सवागुत्ति एस वेयविऊ ॥ स्वामी दामः पुज्यः खल इति अधनः धनपतिरिति सामी दोसो पुजी । खेलोत्ति अर्धगो धणइत्ति ॥ ५९ ॥ नापि अत्र कोपि नियमः स्वस्यकर्मतस्यविनिवेशः तस्यमदृशीकृताचेष्टायेनसः नवि इत्थी कोइ निअमो । सकम्मविर्णिविठसरिसकयचिठो ॥ Jain Education Intel 2010_05 For Private & Personal use only laww.jainelibrary.org
SR No.600040
Book TitleVairagya Shataka
Original Sutra AuthorPurvacharya
AuthorGunvinay
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages176
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size9 MB
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