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________________ साधुसाध्वी ८-जन्म सूतक या मरण सूतकके घरवाले मनुष्य जो कि उसी जन्म मरणवाले घरमें रहते हैं आवश्य॥ ११४ ॥ हो. वे १२ दिन देव पूजा न करें, लेकिन चाहे एक गोत्रके या सगे भाई वा पिताही होवे परन्तु जुदे कीय विचार संग्रहः रहते हो, सूतकवाले घरमें जाना आना न हो, उनको किसी तरहका सूतक नहीं, वास्ते उनको जिन पूजा आदि करनेमें हरकत नहीं और उनके घरसे साधुओंको आहारादि वहोरनेमें भी हरकत नहीं। ९-जो मृतकके घरका मूल कांधीया हो परन्तु जुदे घरमें रहता हो वह १० दिन देवपूजा न करे । १०–अन्य घरके जो मृतकको अडे हो ? वे तीन दिन (२४ प्रहर) देव पूजा तथा प्रतिक्रमण न है। * करें, यानि स्वयं प्रतिक्रमण भणावे नहीं, जो सदाका अखंड नियम होवे तो समता भाव रखके संवरपणेमें रहे, है अथवा अन्य भणाता हो वह सुणे, परन्तु स्वमुखसे नवकारका भी उच्चारण न करे, स्थापना, नवकरवाली पुस्तक आदिके हाथ न लगावे । . ११-जो स्वयं (खुद) मृतकको अडा न हो परन्तु मृतकको अडनेवाले अन्य मनुष्योंको स्नान करे । पहिले अडा हो वह १६ प्रहर तथा एक स्नान करे बाद जो अडा हो वह ८ प्रहर देवपूजा प्रतिक्रमणादि न करे। XXXXXXXX #XXXXXXXXXXX Jain Education Intern 2010_05 For Private & Personal use only ||www.jainelibrary.org
SR No.600039
Book TitleAvashyakiya Vidhi Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLabdhimuni, Buddhisagar
PublisherHindi Jainagam Prakashak Sumati Karyalaya
Publication Year
Total Pages140
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript, Ritual, & Vidhi
File Size7 MB
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