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________________ मञ्जरी टीका पति णामेकत्र विहरमाणानां, प्रवर्तकानां वा गणिनां वा गणधराणां वा एकत्र विहरमाणानां पर्यायज्येष्ठानुसारेणैव मार कृतिकर्म कर्तुं युज्यते । इममर्थ मुचयितुमाह-एवमेव थेराणं' इत्यादि । पर्यायज्येष्ठानुसारेण कृतिकर्म करणे चरणकरणोपयुक्ताः निर्ग्रन्था निर्ग्रन्थ्यश्च अनेक श्रीकल्पमुत्रे “एवं किइम्मविहिं, जुजंता चरणकरणमाउत्ता। ॥४८॥ साहू खवंति कम्मं, अणेगणभवसंचियमणंतं ॥१॥” छाया--एवं कृतिकर्मविधिं युञ्जानाश्चरणकरणायुक्ताः। साधवः क्षपयन्ति कर्म, अनेकभवसंचितमनन्तम् ॥१॥इति तथा-स्वगच्छसंबंधी या भिन्न-भिन्न-गच्छ-संबंधी सांभोगिक अनेक स्थविर एकत्र विचरते हों तो उन्हें भी पर्यायज्येष्ठता के अनुसार ही कृतिकर्म करना चाहिए । इस अभिप्राय को प्रकट करने के लिए कहा है-"एवमेव थेराणं " इत्यादि। पर्याय-ज्येष्ठता के अनुसार कृतिकर्म करने पर चरण-करण क्रिया में उपयोग रखनेवाले साधु और साध्विया अनेक भवों में संचित अनन्त कर्मों का क्षय करते हैं। कहा भी है ___“एयं किइकम्मविहि, जुजंता चरणकरणमाउत्ता। साहू खवंति कम्म, अणेगभवसंचियमणतं” ॥१॥इति॥ इस प्रकार से वन्दना-विधि का प्रयोग करनेवाले तथा चरण-करणरूप क्रिया में लीन मुनिजन अनेक जन्मों में उपार्जित अनन्त कर्मों का क्षय करते है ॥१॥ 'एवमेव थेराणं' इत्यादि. આ જાતની “વંદના વિધિ’ દરેક સાધુમાં, લઘુતા અને નમ્રતાને ગુણ. ભારે-ભાર ખીલવે છે. કહ્યું પણ છે– _ "एयं किइकम्मविहि, मुंजंता चरणकरणमाउत्ता। · साहू खवंति कम्मं, अणेगभवसंचियमणंतं” ॥१॥ અર્થાત્ –વંદન કરતી વખતે ચરણકરણની ક્રિયામાં જે ઉપગ રાખવામાં આવે તો સાધુ-સાધ્વીએ અનેક ભવના સંચિત કરેલા કર્મોનો નાશ કરે છે. સાધુ-સાધ્વીઓના પેટામાં આચાર્ય, ઉપાધ્યાય, ગણાવછેદક, સ્થવિર, JainEducationsationaत. भी मन गधरेन। सभावश थाय छे.For Private & Personal use Only ॥४८॥ Desiww.jainelibrary.org.
SR No.600023
Book TitleKalpasutram Part_1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherSthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti Rajkot
Publication Year1958
Total Pages594
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size21 MB
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