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________________ अञ्जन प्र. कल्प ॥२४६॥ श्रीमदयादवसैन(नि) कस्य नितरां दुःखानि हर्ने क्षमो, मह्यां त्वत्सहसं (शः) प्रभुन च मम (मया) दृष्टो न चा (वा) मे श्रुतः। | ए (ई) द्रत्वं फणिनं चकार सहसोद्-धृत्वा कृशानो-र्भयात् , श्रीशंखेश्वरपार्श्वनाथ भगवन् ! रङ्गेण तुभ्यं नमः ॥१॥ (शार्दल ) प्रणम्य भक्त्या गुरुपादपदम, प्रपन्नसच्छिष्यविवोधकत्वम् । जनप्रबोधाय हि लोकवाग्भि-जैनप्रतिष्ठाविधिमातनोमि ॥२॥ (उपजाति) स्वस्ति श्रीदायक विभु जगनायक जिनचंद । मोहतिमिरने चूरवा प्रगट्यो परमदिनेद ॥१॥ श्रीशंखेसर पासना प्रणमी पद-अरविंद । जैन प्रतिष्ठाविधितणुं तवन करूं मुखकंद ॥२॥ ए सम वीजें को नहीं जैन मांहे मंडाण । जिम सवि पदगज-चरणमें तिम ए मुख्य प्रमाण ॥३॥ संप्रति शासनमां हुआ संप्रति-कुमर नरेंद्र । जिन विहार-जिनश्विनां कीधा कृत्य अमंद ॥४॥ भरुअचमा उक्केस लघु लालासा महवंत । तास तनय प्रेमचंद बलि मुलचंद मतिवंत ॥५॥ प्रेमचंदना दो तनुज खुमालचंद-देवचंद । मुलचंदने गुणनिलय अंगज ताराचंद ॥६॥ खुसालचंदने कुलतिलय पुत्र सवाइचंद । एक दिन गुरुमुखथी सुण्या शंखेश्वर-गुणवृंद ॥७॥ ॥२४६॥ Jain Education a l For Private & Personal Use Only w.jainelibrary.org
SR No.600016
Book TitlePratishthakalpa Anjanshalakavidhi
Original Sutra AuthorSakalchandra Gani
AuthorSomchandravijay
PublisherNemchand Melapchand Zaveri Jain Vadi Upashray Surat
Publication Year
Total Pages340
LanguageDevnagri, Gujarati
ClassificationManuscript, Ritual_text, Vidhi, Devdravya, & Ritual
File Size18 MB
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