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________________ अञ्जन प्र. कल्प ॥२४७॥ पिता-पुत्र उद्यम करी, खरची द्रव्य उदार । मूर्ति शंखेश्वरपार्श्वनी, प्रगट करी मनोहार ॥ ८॥ तास प्रतिष्ठाकारणें, सामग्री सहु जोड । विधिपूर्वक ओच्छव करें, दस दिन मननें कोडि ॥ ९॥ ढाल १ चतुर सनेही मोहना ए देशी जैन प्रतिष्ठामा हवे, शुभलगने शुभ योगे रे, भूमीशोधन पेहेलुं करी, सदगुरुने संयोगे रे इम वेदी-रचना करो १ गंगोदक जलें शुची की, शुद्ध छटा देवरावो रे, फुलवृष्टि स्वस्तिक करी, धूप प्रदीप करावो रे २ पूरव-सनमुख वेदिका, रचि पूरी विविध प्रकारे रे, डोढ हाथ उन्नतपणे, समचतुरंस विचारो रे ३ ते मध्ये श्रीफल ठवो, स्वस्तिक-पंचने विरची रे, पंचरत्न-ग्रंथी ठवी, धूप दशांगे चरची रे ४ बार अंगुल, ग्रंथी नही, एहवा वंस अणायो रे, चउ विदिसे चउ वंसथी, शुभ मंडपने बनायो रे ५ तोरण चिहुं दिशे बांधीने, जुधारा बवरावो रे, वंस-पात्रं सात सातनें उसे इम बाबो रे ६ देवच्छंदो युगते रच्यु, समवसरणन मंडाण रे, उससितभावे जिम रचे, चोखठ सुर-महीराण रे ७ शुभसमये वेदी विचें, विंच नवा पधरावो रे, सोहर स्त्री टोले मली, पीठ थापन विधि गावो रे ८ SUOCASSO GROOVESCRIERES १ रुघवा ॥२४७॥ Jain Education tonal For Private & Personal Use Only Paw.jainelibrary.org
SR No.600016
Book TitlePratishthakalpa Anjanshalakavidhi
Original Sutra AuthorSakalchandra Gani
AuthorSomchandravijay
PublisherNemchand Melapchand Zaveri Jain Vadi Upashray Surat
Publication Year
Total Pages340
LanguageDevnagri, Gujarati
ClassificationManuscript, Ritual_text, Vidhi, Devdravya, & Ritual
File Size18 MB
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