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अञ्जन
प्र. कल्प
॥। १९८||
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पछी शुद्ध पाणीनो कलह नीचेनो श्लोक बोली अभिषेक करat:
जीवनममृतं प्राणद-मकलुषितमदोषमस्तसर्वरुजम् । जलममलमस्तु तीर्था-धिनाथविम्बानुगे स्नात्रे ॥ ५ ॥ (आर्या ) पछी सहस्रमूलमिश्र पाणीनो कलश लइ नीचेनो श्लोक बोली अभिषेक करवो:
विघ्नसहस्रो पशमं सहस्रनेत्र प्रभाव सद्भावम् । दलयतु सहस्रमूलं, शत्रुसहस्रं जिनस्नात्रे || ६ || (आर्या ) पछी शतमूलमिश्र पाणीनो कळश लइ नीचेनो श्लोक बोली अभिषेक करवोः -
शतमर्त्यसमानीतं, शतमूलं शतगुणं शताख्यं च । शतसंख्यं वाञ्छितमिह, जिनाभिषेके सपदि कुरुतात् || ७ || (आर्या) पछी सर्वोपधिमिश्र पाणीनो कळश लड् नीचेनो श्लोक बोली अभिषेक करवो:
सर्वत्रं सर्वसमीहितकरं विजितसर्वम् । सर्वोषधिमण्डलमिह, जिनाभिषेके शुभं ददताम् || ८ || (आर्या ) पछी धूप लड़ नीचे लोक बोली धूप करवो:--
ऊधो भूमिवासि - त्रिदशसुत माशां घ्राणहर्ष -- प्रौढिप्राप्तप्रकर्षः क्षितिरुहरसजः क्षीणपापावगाहः । धूपोऽकूपारकल्प-प्रभवमृतिजरा-कष्ट विस्पष्टदुष्ट- स्फूर्जत्संसारपारा-धिगममतिधियां विश्वभर्तुः करोतु || || (सम्रा) पछी "नमुत्थुणं " कही स्वस्तिकादिथी तैयार करेल, चंदन- पुष्पादिवासित पाणीथी भरेल कळशो नवकार गणी arrai लड़ नीचेना १९ जिनामिषेक श्लोको बोली अभिषेक करवो:--
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