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________________ ८२] छक्खंडागम पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, एक मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, तैजस, कार्मण, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पांच अन्तराय इतनी प्रकृतियोंके बन्ध करनेवाले जीव सर्व जीवराशिके अनन्त बहुभागप्रमाण हैं, तथा अबन्धक जीव सर्व जीवराशिके अनन्तवें भागप्रमाण हैं। सातावेदनीयके बन्धक जीव सर्व जीवराशिके संख्यातवें भाग हैं और अबन्धक सर्व जीवोंके संख्यात बहुभाग हैं । असाताके बन्धक सब जीवोंके संख्यातबहुभाग हैं और अबन्धक संख्यातवें भाग हैं। इसी प्रकार स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध और प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंके भागाभागका विचार उत्कृष्ट-अनुत्कृष्ट और जघन्य- अजघन्यपदोंका आश्रय लेकर गुणस्थानों और मार्गणास्थानोंमें बहुत विस्तारसे किया गया है। (१८) परिमाणप्ररूपणा- इस अनुयोगद्वारमें एक समयके भीतर अमुक प्रकृतिके, अमुक जातिकी स्थितिके, अमुक जातिके अनुभागके और अमुक जातिके प्रदेशोंका बन्ध करनेवाले और नहीं करनेवाले जीवोंके परिमाण (संख्या) का निरूपण किया गया है। जैसे- पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, एक मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, तैजस, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, आतप, उद्योत, निर्माण, तथा पांच अन्तराय; इतनी प्रकृतियोंके बन्ध करनेवाले भी जीव अनन्त हैं और बन्ध नहीं करनेवाले भी जीव अनन्त हैं। स्थितिबन्धकी अपेक्षा आठों ही कर्मोंकी उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करनेवाले जीव असंख्यात हैं। अनुत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करनेवाले जीव अनन्त हैं। सात कर्मोकी जघन्य स्थितिका बन्ध करनेवाले जीव संख्यात हैं, क्योंकि जघन्य स्थितिका बन्ध क्षपकश्रेणीमें ही होता है। अजघन्य स्थितिका बन्ध करनेवाले जीव अनन्त हैं । आयुकर्मकी जघन्य और अजघन्य स्थितिका बन्ध करनेवाले जीव अनन्त हैं । अनुभागबन्धकी अपेक्षा चारों घातिया कर्मोके उत्कृष्ट अनुभागके बन्ध करनेवाले जीव असंख्यात हैं। अनुत्कृष्ट अनुभागके बन्ध करनेवाले अनन्त हैं । जघन्य अनुभागके बन्ध करनेवाले संख्यात है और अजघन्य अनुभागके बन्ध करनेवाले अनन्त हैं। प्रदेशबन्धकी अपेक्षा तीन आयु और वैक्रियिकषटकका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीव असंख्यात हैं। आहारकशरीर और आहारक-अंगोपांगका उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीव संख्यात हैं। तीर्थंकरप्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीव संख्यात हैं और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले असंख्यात हैं। शेषप्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीव असंख्यात हैं और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाले जीव अनन्त हैं । इस प्रकार सभी प्रकृतियोंके जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंके परिमाणका निरूपण ओघ और आदेशसे इस अनुयोगद्वारमें किया गया हैं। (१९) क्षेत्रप्ररूपणा- इस अनुयोगद्वारमें ज्ञानावरणादि कर्मप्रकृतियोंसे चारों प्रकारके बन्ध करनेवाले जीवोंके वर्तमानक्षेत्रकी प्ररूपणा ओघ और आदेशसे बड़े विस्तारके साथ की गई है, जो कि प्रस्तुत ग्रन्थके जीवस्थानकी क्षेत्रप्ररूपणाके आधारपर सहजमें ही जानी जा सकती है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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