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________________ 20 30 5 पृष्ठ ४ ५ 5555 ५ ५ ५ ५ ५ 6 ू १० १३ १७ १७ २६ ३९ ४४ Jain Education International पंक्ति ३० १ २ ३-४ ५ ६ १५ ३ २४ १६ २४ २५ अशुद्ध पाठ २८ उन्हीं उन्हीं की वर्तमान अवगाहनाकी प्ररूपणा की जाती है । शुद्धि-पत्रक उक्त द्रव्योंकी जिन द्रव्योंके अस्तित्वादिका उक्त द्रव्यों के उन्हीं द्रव्योंकी ये हैं- जो भाव कर्मों के होता है । इस गुणस्थान में जिसन उक्त पांच कहते हैं । इन छहों होती है । इ उसमें कपाटरूप २६ [ अण्णाणि णाणेण ] ६-८ स्वच्छन्द हो, काम करनेमें मन्द हो, वर्तमान कार्य करनेमें विवेक रहित शुद्ध पाठ उन्हीं जीवों के उन्हीं जीवोंके वर्तमान क्षेत्रकी प्ररूपणा करता है । उक्त जीवोंकी जिन जीवों की स्थितिका उक्त जीवों के उन्हीं जीवों की ये हैं - जो भाव कर्मोंके उदयसे उत्पन्न होता है, उसे औदयिकभाव कहते हैं । जो भाव होता है और परिणामों के निमित्तसे कदाचित् मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वको भी प्राप्त हो जाता है । इस गुणस्थान में जिसने द्वितीयादि चार कहते हैं । यह पर्याप्ति भाषापर्याप्तिके पश्चात् एक अन्तर्मुहूर्तमें पूर्ण होती है । इन छहों होती है। यहां इतना विशेष ज्ञातव्य है। कि यद्यपि एक एक पर्याप्तिके पूर्ण होनेका काल अन्तर्मुहूर्त कहा है, तथापि छहों पर्याप्तियोंकी पूर्णताका समुच्चय काल भी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण ही है । इन उसमें दण्डसमुद्धात के समय औदारिककाययोग, कपाटरूप [ अण्णाणाणि णाणेण ] स्वच्छन्द हो, ऐसे जीव For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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