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________________ ५, ६, ७०८] बंधणाणियोगहारे चूलिया [७८७ तदो अंतोमुहुत्तं गंतूण सुहुमणिगोदजीवपज्जत्तयाणं समिलाजवमज्झं ॥ ६९६ ॥ तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर सूक्ष्म निगोद पर्याप्त जीवोंका शमिलायवमध्य होता है ॥ तदो अंतोमुहत्तं गंतूण बादरणिगोदजीवपज्जत्तयाणं समिलाजवमझं ॥ ६९७ ॥ तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर बादर निगोद पर्याप्त जीवोंका शमिलायवमध्य होता है ।। तदो अंतोमुहत्तं गंतूण एइंदियस्स जहणिया पज्जत्तणिव्यत्ती ॥ ६९८ ॥ तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर एकेन्द्रियकी जघन्य पर्याप्तनिवृत्ति होती है ॥ ६९८ ॥ तदो अंतोमुहत्तं गंतूण सम्मुच्छिमस्स जहणिया पज्जत्तणिव्यत्ती ।। ६९९ ॥ तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर सम्मूछिमकी जघन्य पर्याप्त निर्वृत्ति होती है ॥ ६९९ ॥ तदो अंतोमुहत्तं गंतूण गम्भोवक्कंतियस्स जहणिया पज्जत्तणिव्यत्ती ॥ ७०० ॥ तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर गर्भोपक्रान्तिककी जघन्य पर्याप्त निर्वृत्ति होती है ॥७००॥ तदो दसवाससहस्साणि गंतूण ओववादियस्स जहणिया पज्जत्तणिव्यत्ती ॥७०१॥ तत्पश्चात् दस हजार वर्ष जाकर औपपादिककी जघन्य पर्याप्त निर्वृत्ति होती है ॥७०१॥ तदो बावीसवाससहस्साणि गंतूण एइंदियस्स उक्कस्सिया पज्जत्तणिव्वत्ती॥ तत्पश्चात् बाईस हजार वर्ष जाकर एकेन्द्रियकी उत्कृष्ट पर्याप्त निर्वृत्ति होती है ॥७०२॥ तदो पुव्वकोडिं गंतूण सम्मुच्छिमस्स उक्कस्सिया पज्जत्तणिव्यत्ती ॥ ७०३ ॥ तत्पश्चात् पूर्वकोटि जाकर सम्मूछिमकी उत्कृष्ट पर्याप्त निवृत्ति होती है ॥ ७०३ ॥ तदो तिण्णि पलिदोवमाणि गंतूण गब्भोवक्कंतियस्स उक्कस्सिया पज्जत्तणिवती ॥ ७०४॥ तत्पश्चात् तीन पल्य जाकर गर्भोपक्रान्तिककी उत्कृष्ट पर्याप्त निर्वृत्ति होती है ॥७०४॥ तदो तेत्तीसं सागरोवमाणि गंतूण ओववादियस्स उक्कस्सिया पज्जत्तणिव्यत्ती ॥ तत्पश्चात् तेतीस सागर जाकर औपपादिककी उत्कृष्ट पर्याप्त निर्वृत्ति होती है ॥ ७०५॥ तस्सेव बंधणिज्जस्स तत्थ इमाणि चत्तारि अणियोगद्दाराणि णायव्वाणि भवंतिबग्गणपरूवणा वग्गणणिरूवणा पदेसट्टदा अप्पाबहुए त्ति ॥ ७०६ ॥ उसी बन्धनीयकी प्ररूपणामें ये चार अनुयोगद्वार ज्ञातव्य हैं- वर्गणाप्ररूपणा, वर्गणानिरूपणा, प्रदेशार्थता और अल्पबहुत्त्व ।। ७०६ ॥ वग्गणपरूवणदाए इमा एयदेसिया परमाणुपोग्गलदव्यवग्गणा णाम ॥ ७०७ ॥ इमा दुपदेसियपरमाणुपोग्गलदव्ववग्गणा णाम ॥ ७०८ ॥ एवं तिपदेसिय-चदुपदेसियपंचपदेसिय-छप्पदेसिय-सत्तपदेसिय - अट्ठपदेसिय - णवपदेसिय - दसपदेसिय-संखेज्जपदेसिय Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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