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________________ ७५६ ] Jain Education International छक्खंडागमे वग्गणा-खंड सव्वत्थोवं खुद्दाभवग्गहणं ॥ ३०४ ॥ क्षुल्लकभवग्रहण सबसे स्तोक है ॥ ३०४ ॥ इंदिस्त जहणिया पज्जत्तणिव्वत्ती संखेज्जगुणा ॥ ३०५ ॥ उससे एकेन्द्रिय जीवकी जघन्य पर्याप्त निर्वृत्ति संख्यातगुणी हैं ॥ ३०५ ॥ समुच्छिमस्स जहणिया पज्जत्तणिव्वत्ती संखेज्जगुणा ॥ ३०६ ॥ उससे सम्मूर्च्छन जीवकी जघन्य पर्याप्त निर्वृत्ति संख्यातगुणी है ॥ ३०६ ॥ गब्भोवक्कंतियस्स जहणिया पज्जत्तणिव्वत्ती संखेज्जगुणा ॥ ३०७ ॥ उससे गर्भोपकान्तिक जीवकी जघन्य पर्याप्त निर्वृत्ति संख्यातगुणी है ॥ ३०७ ॥ उववादमस्स जहणिया पज्जत्तणिव्वत्ती संखेज्जगुणा ॥ ३०८ ॥ उससे औपपादिक जीवकी जघन्य पर्याप्त निर्वृत्ति संख्यातगुणी है ॥ ३०८ ॥ एइंदियस्स णिव्वत्तिट्ठाणाणि संखेज्जगुणाणि ॥ ३०९ ॥ उससे एकेन्द्रिय जीवके निर्वृत्तिस्थान संख्यातगुणे हैं ॥ ३०९ ॥ जीवणियाणाणि विसेसाहियाणि ।। ३१० ॥ उनसे जीवनीयस्थान विशेष अधिक हैं ॥ ३१० ॥ उक्कस्सिया णिव्वत्ती विसेसाहिया ।। ३११ ।। उनसे उत्कृष्ट निर्वृत्ति विशेष अधिक है ॥ ३११ ॥ समुच्छिमस्स णिव्वत्तिट्ठाणाणि संखेज्जगुणाणि ॥ ३१२ ॥ उससे सम्मूर्छन जीत्रके निर्वृत्तिस्थान संख्यातगुणे हैं ॥ ३१२ ॥ जीवणियाणाणि विसेसाहियाणि ।। ३१३ ।। उनसे जीवनीयस्थान विशेष अधिक हैं ॥ ३१३ ॥ उक्कस्सिया णिव्वत्ती विसेसाहिया ।। ३१४ ॥ उनसे उत्कृष्ट निर्वृत्ति विशेष अधिक है ॥ ३१४ ॥ गन्भोवक्कतियस्स णिव्वत्तिट्ठाणाणि असंखेज्जगुणाणि ।। ३१५ ॥ उससे गर्भोपक्रान्तिकके निर्वृत्तिस्थान असंख्यातगुणे हैं ॥ ३१५ ॥ जीवणियद्वाणाणि विसेसाहियाणि ।। ३१६ ।। उनसे जीवनीयस्थान विशेष अधिक हैं ॥ ३१६ ॥ उक्कस्सिया णिव्वत्ती विसेसाहिया ।। ३१७ ॥ उनसे उत्कृष्ट निर्वृत्ति विशेष अधिक है ॥ ३१७ ॥ [ ५, ४, ३०४ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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