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________________ बंधणाणियोगद्वारे भावबंधपरूवणा [ ७२३ क्षायोपशमिक दृष्टिवादवर, क्षायोपशमिक गणी, क्षायोपशमिक वाचक, क्षायोपशमिक दशपूर्वर एवं क्षायोपशमिक चतुर्दशपूर्वधर; ये तथा इनको आदि लेकर और भी जो दूसरे क्षायोपशमिक भाव हैं वह सब तदुभयप्रत्ययिक जीवभावबन्ध है; यह इस सूत्रका अभिप्राय है ॥ १९ ॥ ५, ६, २२ ] जो सो अजीवभावबंधो णाम सो तिविहो- विवागपच्चइयो अजीवभावबंधो चेव अविवागपच्चयो अजीवभावबंधो चेव तदुभयपच्चइयो अजीवभावबंधो चेव ॥ २० ॥ अजीवभावबन्ध तीन प्रकारका है- विपाकप्रत्ययिक अजीवभावबन्ध, अविपाकप्रत्ययिक अजीवभावबन्ध और तदुभयप्रत्ययिक अजीवभावबन्ध ॥ २० ॥ जो अजीवभाव मिथ्यात्व और अविरति आदिके आश्रयसे अथवा पुरुषके प्रयत्न के आश्रयसे उत्पन्न होते हैं वे विपाकप्रत्ययिक अजीवभावबन्ध कहे जाते हैं । जो अजीवभाव उक्त मिथ्यात्वादि कारणोंके विना उत्पन्न होते हैं उनका नाम अविपाकप्रत्ययिक, तथा जो उन दोनों ही कारणोंके आश्रयसे उत्पन्न होते हैं उनका नाम तदुभयप्रत्ययिक अजीवभावबन्ध है 1 जो सो विवागपच्चइयो अजीवभावबंधो णाम तस्स इमो णिदेसो- पओगपरिणदा वण्णा ओगपरिणदा सहा पओगपरिणदा गंधा पओगपरिणदा रसा पओगपरिणदा फासा पगपरिणदा गदी पओगपरिणदा ओगाहणा पओगपरिणदा संठाणा पओगपरिणदा खंधा पओगपरिणदा खंघदेसा पओगपरिणदा खंघपदेसा जे चामण्णे एवमादिया पओगपरिणदसंजुत्ता भावा सो सव्वो विवागपच्चइओ अजीवभावबंधो णाम ।। २१ । जो वह विपाकप्रत्ययक अजीवभावबन्ध है उसका निर्देश इस प्रकार है- प्रयोगपरिणत वर्ण, प्रयोगपरिणत शब्द, प्रयोगपरिणत गन्ध, प्रयोगपरिणत रस, प्रयोगपरिणत स्पर्श, प्रयोगपरिणत गति, प्रयोगपरिणत अवगाहना, प्रयोगपरिणत संस्थान, प्रयोगपरिणत स्कन्ध, प्रयोगपरिणत स्कन्धदेश और प्रयोगपरिणत स्कन्धप्रदेश; ये तथा इनको आदि लेकर और भी जो प्रयोगपरिणत संयुक्त भाव होते हैं वह सब विपाकप्रत्ययिक अजीवभावबन्ध कहलाता है ॥ २१ ॥ वर्णादि नामकर्म विशेषके उदयसे औदारिक शरीरस्कन्धोंमें उत्पन्न होनेवाले वर्णादि रूप पुद्गलपरिणाम तथा हल्दी आदिके प्रयोगसे उत्पन्न होनेवाले वर्णभेद रूप पुद्गलपरिणाम विपाकप्रत्ययिक अजीवभावबन्ध है, ऐसा सूत्रका अभिप्राय समझना चाहिये । जो सो अविवागपच्चइयो अजीवभावबंधो णाम तस्स इमो णिद्देसो- विस्ससा - परिणदा वण्णा विस्ससापरिणदा सदा विस्ससापरिणदा गंधा विस्ससापरिणदा रसा विस्ससापरिणदा फासा विस्सापरिणदा गदी विस्ससापरिणदा ओगाहणा विस्सापरिणदा संठाणा विस्ससापरिणदा खंघा, विस्ससापरिणदा खंघदेसा विस्ससापरिणदा खंघपदेसा जे चामण्णे एवमादिया विस्ससापरिणदा संजुत्ता भावा सो सव्वो अविवागपच्चइओ अजीवभावबंधो णाम ।। २२ ।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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