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________________ पडिअणिओगद्दारे णामपयडिपरूवणा [ ७१५ जो वह आनुपूर्वी नामकर्म है वह चार प्रकारका है- नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यञ्च - गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी और देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्म ॥ १३१ ॥ रिगइपाओग्गाणु पुत्रिणामाए केवडियाओ पयडीओ ? ।। १३२ ।। णिरयगहपाओग्गाणुपुत्रिणामा पयडीओ अंगुलस्स असंखेज्जदिभागमेत्तवाहल्लाणि तिरियपदराणि सेडीए असंखेज्जदिभागमेत्तेहि ओगाहणवियप्पेहि गुणिदाओ । एवडियाओ पयडीओ ॥ ५, ५, १४०.] नरकगति नामकर्मकी कितनी प्रकृतियां है ? ॥ १३२ ॥ नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्मकी प्रकृतियां अंगुलके असंख्यातवें भाग मात्र बाहल्यरूप तिर्यक्प्रतरोंको श्रेणिके असंख्यातवें भाग मात्र अवगाहनाविकल्पोंसे गुणित करनेपर जो लब्ध हो उतनी हैं। उसकी इतनी ही मात्र प्रकृतियां है ॥ तिरिक्खगड़पाओग्गाणुपुव्विणामाए केवडियाओ पयडीओ ? ।। १३४ ॥ तिरिक्खगहपाओग्गाणुपुव्विणामाए पयडीओ लोओ सेडीए असंखेज्जदिभागमेत्तेहि अगाहणविहि गुणिदाओ । एवडियाओ पयडीओ ।। १३५ ।। तिर्यंगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्मकी कितनी प्रकृतियां है ! ॥ १३४ ॥ तिर्थंगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्मकी प्रकृतियां लोकको जगश्रेणिके असंख्यातवें भाग मात्र अवगाहनाविकल्पोंसे गुणित करने पर जो लब्ध हो उतनी हैं । उसकी इतनी मात्र प्रकृतियां हैं ॥ १३५ ॥ मणुस गइपाओग्गाणुपुव्विणामाए केवडियाओ पयडीओ ? ।। १३६ ।। मणुसगइपाओग्गाणुपुव्विणामाए पयडीओ पणदालीसजोयण सदसहस्सबाहल्लाणि तिरियपदराणि उड्ढकवाडछेदणणिप्फण्णाणि सेडीए असंखेज्जदिभागमेत्तेहि ओगाहणावियप्पेहि गुणिदाओ । एवडियाओ पयडीओ ॥ १३७ ॥ मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्मकी कितनी प्रकृतियां हैं ? ॥ प्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्मकी प्रकृतियां उर्ध्वकपाटछेदनसे निष्पन्न पैंतालीस लाख तिर्यक्प्रतरोंको जगश्रेणिके असंख्यातवें भाग मात्र अवगाहनाविकल्पोंसे गुणित उतनी हैं । उसकी इतनी मात्र प्रकृतियां हैं ॥ १३७ ॥ देवगइपाओग्गाणुपुब्विणामाए केवडियाओ पयडीओ १ ॥ १३८ ॥ देवगहपाओग्गाणुपुव्विणामाए पयडीओ णवजोयणसदबाहल्लाणि तिरियपदराणि सेडीए असंखेज्ज - दिभागमेत्तेहि ओगाहणवियप्पेहि गुणिदाओ । एवडियाओ पयडीओ ।। १३९ ।। १३६ ॥ मनुष्यगति-योजन बाहल्यस्वरूप करनेपर जो लब्ध हो देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्मकी कितनी प्रकृतियां हैं ? ॥ १३८ ॥ देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्मकी प्रकृतियां नौ सौ योजन बाहल्यरूप तिर्यक्प्रतरोंको जगश्रेणीके असंख्यातवें भाग मात्र अवगाहनाविकल्पोंसे गुणित करनेपर जो लब्ध हो उतनी हैं। उसकी इतनी मात्र प्रकृतियां हैं ॥ एत्थ अप्पा बहुगं ॥ १४० ॥ अब यहां अल्पबहुत्त्वकी प्ररूपणा की जाती है ॥ १४० ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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