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________________ प्रस्तावना [७१ वर्गणा दो प्रकारकी है- अभ्यन्तरवर्गणा और बाह्यवर्गणा। अभ्यन्तरवर्गणा भी दो प्रकारकी है- एक श्रेणिवर्गणा और नानाश्रेणिवर्गणा । एकश्रेणिवर्गणाके तेईस भेद हैं- १ एकप्रदेशिकपरमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणा, २ संख्यातनदेशिकपरमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणा, ३ असंख्यातप्रदेशिकपरमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणा, ४ अनन्तप्रदेशिकपरमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणा, ५ आहारद्रव्यवर्गणा, ६ अग्रहणद्रव्यवर्गणा, ७ तैजसद्रव्यवर्गणा, ८ अग्रहणद्रव्यवर्गणा, ९ भाषाद्रव्यवर्गणा, १० अग्रहणद्रव्यवर्गणा, ११ मनोद्रव्यवर्गणा, १२ अग्रहणद्रव्यवर्गणा, १३ कार्मणद्रव्यवर्गणा, १४ ध्रुवस्कन्धद्रव्यवर्गणा, १५ सान्तरनिरन्तरद्रव्यवर्गणा, १६ ध्रुवशून्यद्रव्यवर्गणा, १७ प्रत्येकशरीरद्रव्यवर्गणा, १८ ध्रुवशून्यद्रव्यवर्गणा, १९ बादर निगोदद्रव्यवर्गणा, २० ध्रुवशून्यद्रव्यवर्गणा, २१ सूक्ष्म निगोदद्रव्यवर्गणा, २२ ध्रुवशून्यद्रव्यवर्गणा और २३ महास्कन्धद्रव्यवर्गणा । एक परमाणुकी एकप्रदेशिकपरमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणा संज्ञा है। द्विप्रदेशिकसे लेकर उत्कृष्ट संख्यातप्रदेशिकपरमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणा तक सब वर्गणाओंकी संख्यातप्रदेशिकपरमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणा संज्ञा है । यह दूसरी वर्गणा है । जघन्य असंख्यातप्रदेशिकसे लेकर उत्कृष्ट असंख्यातप्रदेशिकपरमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणाओंकी असंख्यातप्रदेशिकपरमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणा संज्ञा है। यह तीसरी वर्गणा है । जघन्य अनन्तप्रदेशिकसे लेकर आहारवर्गणासे पूर्व तककी अनन्तप्रदेशिक और अनन्तानन्तप्रदेशिक जितनी वर्गणाएं हैं उन सबकी अनन्तप्रदेशिकपरमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणा संज्ञा है। यह चौथी वर्गणा है । यहां यह ज्ञातव्य है कि संख्यातप्रदेशिकवर्गणाके एक अंक कम उत्कृष्ट संख्यातप्रमाण भेद होते हैं । तथा उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यातमेंसे उत्कृष्ट संख्यातके कम करनेपर जो शेष रहे, उसमें एक अंकके मिलानेपर जितना प्रमाण होता है, उतने ही असंख्यातप्रदेशिकवर्गणाके भेद होते हैं। संख्यातप्रदेशिकवर्गणाओंसे असंख्यातप्रदेशिकवर्गणाएं असंख्यातगुणी हैं। जघन्य अनन्तप्रदेशिकवर्गणासे लेकर आहारवर्गणाके पूर्वतककी जितनी अनन्तप्रदेशिकवर्गणाएं हैं, उनका प्रमाण भी अनन्त है । आहारवर्गणासे पूर्ववाली ये चारों ही वर्गणाएं अग्राह्य हैं, अर्थात् किसी भी जीवके द्वारा इनका कभी भी ग्रहण नहीं होता है। यद्यपि ये संख्यातप्रदेशिकवर्गणाएं संख्यात हैं, असंख्यातप्रदेशिकवर्गणाएं असंख्यात हैं और आहारवर्गणासे पूर्व तककी अनन्तप्रदेशिकवर्गणाएं • अनन्त हैं, तथापि जातिकी अपेक्षा उन्हें एक-एक कहा गया है । उत्कृष्ट अनन्तप्रदेशी द्रव्यवर्गणामें एक परमाणुके मिलानेपर जघन्य आहारद्रव्यवर्गणा होती है। पुनः एक एक परमाणुके बढ़ाते हुए अभव्योंसे अनन्तगुणित और सिद्धोंके अनन्तवें भागप्रमाण भेदोंके जानेपर उत्कृष्ट आहारद्रव्यवर्गणा प्राप्त होती है । यह पांचवी वर्गणा है । इस आहारद्रव्यवर्गणाके परमाणुओंसे औदारिक, वैक्रियिक और आहारकशरीरका निर्माण होता है। उत्कृष्ट आहारद्रव्यवर्गणाके ऊपर एक परमाणुके बढानेपर जघन्य अग्रहणद्रव्यवर्गणा प्राप्त होती है। उसके ऊपर एक एक परमाणुके बढ़ाते हुए अभव्योंसे अनन्तगुणित और सिद्धोंके अनन्त भागप्रमाण भेदोंके जानेपर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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