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________________ ७०२ ] छक्खंडागमे वग्गणा-खंडं [ ५, ५, ५० समास, वस्तु, वस्तुसमास, पूर्व और पूर्वसमास; ये श्रुतज्ञानके बीस भेद जानने चाहिये ॥ ४८ ॥ तथा पर्यायावरणीय, पर्यायसमासावरणीय, अक्षरावरणीय, अक्षरसमासावरणीय, पदावरणीय, पदसमासावरणीय, संघातावरणीय, संघातसमासावरणीय, प्रतिपत्ति-आवरणीय, प्रतिपत्तिसमासावरणीय, अनुयोगद्वारावरणीय, अनुयोगद्वारसमासावरणीय, प्राभृतप्राभृतावरणीय, प्राभृतप्राभृतसमासावरणीय, प्राभृतावरणीय, प्राभृतसमासावरणीय, वस्तु-आवरणीय, वस्तुसमासावरणीय, पूर्वावरणीय और पूर्वसमासावरणीय; ये श्रुतज्ञानावरणके बीस भेद हैं ।। ४९ ॥ तस्सेव सुदणाणावरणीयस्स अण्णं परूवणं कस्सामो ॥५०॥ पावयणं पवयणीयं पवयणट्ठो गदीसु मग्गणदा आदा परंपरलद्धी अणुत्तरं पवयण पवयणी पक्यणद्धा पवयणसण्णियासो णयविधी जयंतरविधी भंगविधी भंगविधिविसेसो पुच्छाविधि पुच्छाविधिविसेसो तचं भूदं भव्वं भवियं अवितथं अविहदं वेदणायं सुद्धं सम्माइट्ठी हेदुवादो णयवादो पवरवादो मग्गवादो सुदवादो परवादो लोइयवादो लोगुत्तरीयवादो अग्गं मग्गं जहाणुमग्गं पुव्वं जहाणुपुत्वं पुयादिपुव्वं चेदि ।। ५१ ॥ उसी श्रुतज्ञानावरणकी अन्य प्ररूपणा की जाती है ॥ ५० ॥ प्रावचन, प्रवचनीय, प्रवचनार्थ, गतियोंमें मार्गणता, आत्मा, परम्परालग्धि, अनुत्तर, प्रवचन, प्रवचनी, प्रवचनाद्धा, प्रवचनसंनिकर्ष, नयविधि, नयान्तरविधि, भंगविधि, भंगविधिबिशेष, पृच्छाविधि, पृच्छाविधिविशेष, तत्त्व, भूत, भव्य, भविष्यत्: अवितथ, अविहत, वेद, न्याय्य, शुद्ध, सम्यग्दृष्टि, हेतुवाद, नयवाद, प्रवरवाद, मार्गवाद, श्रुतवाद, परवाद, लौकिकवाद, लोकोत्तरीयवाद, अग्यमार्ग, यथानुमार्ग, पूर्व, यथानुपूर्व और पूर्वातिपूर्व; ये इकतालीस श्रुतज्ञानके पर्यायनाम हैं ॥ ५१ ।। इनका विशेष अर्थ धवला (पु. १३, पृ. २८०-८५) से जानना चाहिये। ओहिणाणावरणीयस्स कम्मस्स केवडियाओ पयडीओ ? ।। ५२ ॥ अवधिज्ञानावरण कर्मकी कितनी प्रकृतियां हैं ? ॥ ५२ ॥ ओहिणाणावरणीयस्स कम्मस्स असंखेज्जाओ पयडीओ ॥ ५३ ॥ अवधिज्ञानावरण कर्मकी असंख्यात प्रकृतियां हैं ॥ ५३ ॥ तं च ओहिणाणं दुविहं भवपच्चइयं चेव गुणपच्चइयं चेव ॥५४॥ जंतं 'भवपच्चइयं' तं देव-णेरइयाणं ॥ ५५ ॥ जं तं गुणपच्चइयं तं तिरिक्ख-मणुस्साणं ॥५६॥ वह अवधिज्ञान दो प्रकारका है- भवप्रत्यय, अवधिज्ञान और गुणप्रत्यय अवधिज्ञान ॥ ५४ ॥ जो वह भवप्रत्यय अवधिज्ञान है वह देवों और नारकियोंके होता है ॥ ५५ ॥ तथा जो वह गुणप्रत्यय अवधिज्ञान है वह तिर्यंचों और मनुष्योंके होता है । ५६ ॥ तं च अणेयविहं- देसोही परमोही सव्वोही हायमाणयं वड्ढमाणयं अवद्विदं अणवद्विदं अणुगामी अणणुगामी सप्पडिवादी अप्पडिवादी एयक्खेत्तमणेयक्खेत्तं ।। ५७ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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