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________________ ६९२ ] छक्खंडागमे वग्गणा-खंडं [५, ३, ३१ . जो सो भावफासो णाम ॥ ३१ ॥ उवजुत्तो पाहुडजाणओ सो सव्वो भावफासो णाम ॥ ३२ ॥ ___ अब भावस्पर्शका अधिकार है ॥ ३१ ॥ जो स्पर्शप्राभृतका ज्ञाता होकर वर्तमानमें उसमें उपयुक्त है वह सब भावस्पर्श है ॥ ३२ ॥ __ एदेसिं फासाणं केण फासेण पयदं ? कम्मफासेण पयदं ॥३३॥ - इन स्पोंमेंसे प्रकृतमें कौन स्पर्श लिया गया है ? इन स्पर्शोमेंसे प्रकृतमें कर्मस्पर्शकी विवक्षा है ॥ ३३ ॥ ॥ स्पर्श अनुयोगद्वार समाप्त हुआ ॥ ३ ॥ ४. कम्माणिओगद्दारं कम्मे त्ति ॥१॥ अब यहां महाकर्म प्रकृति प्राभृतमें प्ररूपित चौबीस अनुयोगद्वारोंमेंसे चौथा कर्म नामका अनुयोगद्वार अधिकृत है ॥ १ ॥ ___ तत्थ इमाणि सोलस अणियोगद्दाराणि णादव्वाणि भवंति- कम्मणिक्खेवे कम्मणयविभासणदाए कम्मणामविहाणे कम्मदव्वविहाणे कम्मखेत्तविहाणे कम्मकालविहाणे कम्मभावविहाणे कम्मपच्चयविहाणे कम्मसामित्तविहाणे कम्मकम्मविहाणे कम्मगइविहाणे कम्मअणंतरविहाणे कम्मसंणियासविहाणे कम्मपरिमाणविहाणे कम्मभागाभागविहाणे कम्मअप्पाबहुए त्ति ॥ २॥ ___ उसमें ये सोलह अनुयोगद्वार ज्ञातव्य हैं- कर्मनिपेक्ष, कर्मनयविभाषणता, कर्मनामविधान, कर्मद्रव्यविधान, कर्मक्षेत्रविधान, कर्मकालविधान, कर्मभावविधान, कर्मप्रत्ययविधान, कर्मस्वामित्वविधान, कर्मकर्मविधान, कर्मगतिविधान, कर्मअनन्तरविधान, कर्मसंनिकर्षविधान, कर्मपरिमाणविधान, कर्मभागाभागविधान और कर्मअल्पबहुत्व ॥ २ ॥ कम्मणिक्खेवे त्ति ॥३॥ दसविहे कम्मणिक्खेवे-नामकम्मे ठवणकम्मे दव्वकम्मे पओअकम्मे समुदाणकम्मे आधाकम्मे इरियावहकम्मे तबोकम्मे किरियाकम्मे भावकम्मे चेदि ॥४॥ ___ अब कर्मनिपेक्षका अधिकार है ॥ ३ ॥ कर्मनिपेक्ष दस प्रकारका है- नामकर्म, स्थापनाकर्म, द्रव्यकर्म, प्रयोगकर्म, समवदानकर्म, अधःकर्म, ईर्यापथकर्म, तपःकर्म, क्रियाकर्म और भावकर्म ॥ ४ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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