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________________ ४, २, १३, १२८] वेयणमहाहियारे वेयणसण्णियासविहाणाणियोगद्दारं [६६३ __ जस्स णाणावरणीयवेयणा भावदो जहण्णा तस्स दव्वदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥११४ ॥ जहण्णा वा अजहण्णा वा, जहण्णादो अजहण्णा पंचट्ठाणपदिदा ॥११५ ॥ जिसके ज्ञानावरणीयकी वेदना भावकी अपेक्षा जघन्य होती है उसके द्रव्यकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ ११४ ॥ वह उसके जघन्य भी होती है और अजघन्य भी । जघन्यकी अपेक्षा अजघन्य पांच स्थानोंमें पतित होती है ॥ ११५ ॥ ___ तस्स खेत्तदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥ ११६ ॥ णियमा अजहण्णा असंखेज्जगुणब्भहिया ॥ ११७ ॥ उसके क्षेत्रकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ॥ ११६ ॥ उसके वह नियमसे अजघन्य और असंख्यातगुणी अधिक होती है ॥ ११७ ॥ तस्स कालदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥ ११८ ॥ जहण्णा ॥ ११९ ॥ उसके कालकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ ११८ ॥ वह उसके जघन्य होती है ॥ ११९ ॥ एवं दंसणावरणीय-मोहणीय-अंतराइयाणं ॥ १२० ॥ इसी प्रकार दर्शनावरणीय मोहनीय और अन्तराय कर्मोकी जघन्य वेदनासम्बन्धी प्ररूपणा करनी चाहिये ॥ १२० ॥ जस्स वेयणीयवेयणा दव्वदो जहण्णा तस्स खेत्तदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥ १२१ ॥ णियमा अजहण्णा असंखेज्जगुणब्भहिया ॥ १२२ ॥ जिसके वेदनीय कर्मकी वेदना द्रव्यकी अपेक्षा जघन्य होती है उसके वह क्या क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ १२१ ॥ उसके वह नियमसे अजघन्य और असंख्यातगुणी अधिक होती है ॥ १२२ ॥ तस्स कालदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥ १२३ ॥ जहण्णा ॥१२४ ॥ उसके कालकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ १२३ ॥ उसके वह जघन्य होती है ॥ १२४ ।। तस्स भावदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥ १२५ ॥ जहण्णा वा अजहण्णा वा, जहण्णादो अजहण्णा अणंतगुणब्भहिया ॥१२६ ॥ उसके भावकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ १२५ ॥ उसके वह जघन्य भी होती है और अजघन्य भी। जघन्यकी अपेक्षा अजघन्य अनन्तगुणी अधिक है ॥१२६॥ जस्स वेयणीयवेयणा खेत्तदो जहण्णा तस्स दव्वदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥१२७ ॥ णियमा अजहण्णा चउट्ठाणपदिदा ॥ १२८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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