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________________ ४, २, ७, २५५] वेयणमहाहियारे वेयणभावविहाणे बिदिया चूलिया [६३५ कायट्ठिदि असंखेज्जगुणा ॥ २४४ ॥ अग्निकायिकोंकी कायस्थिति उनसे असंख्यातगुणी है ॥ २४४ ॥ अणुभागबंधज्झवसाणट्ठाणाणि असंखेज्जगुणाणि ॥ २४५ ॥ अनुभागबन्धाध्यवसानस्थान असंख्यातगुणे हैं ॥ २४५ ॥ वड्ढिपरूवणदाए अत्थि अणंतभागवड्ढि-हाणी असंखेज्जभागवढि-हाणी संखेज्जभागवड्ढि-हाणी संखेज्जगुणवड्ढि-हाणी असंखेज्जगुणवड्ढि-हाणी अणंतगुणवड्ढि-हाणी ॥ वृद्धिप्ररूपणाकी अपेक्षा अनन्तभागवृद्धि-हानि, असंख्यातभागवृद्धि-हानि, संख्यातभागवृद्धि-हानि, संख्यातगुणवृद्धि हानि, असंख्यातगुणवृद्धि-हानि और अनन्तगुणवृद्धि हानि होती है ॥२४॥ पंचवड्ढि-पंचहाणीओ केवचिरं कालादो होंति ? ॥ २४७॥ पांच वृद्धियां व हानियां कितने काल होती है ? ॥ २४७ ॥ जहण्णेण एगसमओ ॥ २४८॥ जघन्यसे वे एक समय होती हैं ॥ २४८ ॥ उक्कस्सेण आवलियाए असंखेज्जदिभागो ॥ २४९ ॥ उत्कर्षसे वे आवलीके असंख्यातवें भाग काल तक होती हैं ? ॥ २४९॥ अणंतगुणवढि-हाणीयो केवचिरं कालादो होंति ? ॥ २५० ॥ अनन्तगुणवृद्धि और हानि कितने काल होती हैं ॥ २५० ॥ जहण्णेण एगसमओ ॥ २५१ ॥ जघन्यसे वे एक समय होती हैं ॥ २५१ ॥ उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं ॥ २५२ ॥ उत्कृष्टसे वे अन्तर्मुहूर्त काल तक होती हैं ॥ २५२ ॥ जवमज्झपरूवणदाए अणंतगुणवड्ढी अणंतगुणहाणी च जवमझं ॥ २५३ ॥ यवमध्यकी प्ररूपणामें अनन्तगुणवृद्धि और अनन्तगुणहानि यवमध्य हैं ॥ २५३ ॥ पज्जसाणपरूवणदाए अणंतगुणस्स उवरि अणंतगुणं भविस्सदि त्ति पज्जवसाणं ॥ पर्यवसानप्ररूपणामें सब स्थानोंकी पर्यवान अनन्तगुणके ऊपर अनन्तगुणा होगा, यह पर्यवसान है ॥ २५४ ॥ __ अप्पाबहुए त्ति तत्थ इमाणि दुवे अणियोगद्दाराणि अणंतरोवणिधा परंपरोवणिधा ॥ २५५॥ अल्पबहुत्व इस अधिकारमें अनन्तरोपनिधा और परम्परोपनिधा ये दो अनुयोगद्वार हैं । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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