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________________ ४, २, ७, १९८] वेयणमहाहियारे वेयणभावविहाणे बिदिय चूलिया [६२९ कसायउवसामयस्स गुणसेडिकालो संखेज्जगुणो ॥ १९१ ॥ उससे चारित्रमोहोपशामकका गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ॥ १९१ ॥ दसणमोहक्खवयस्स गुणसेडिकालो संखेज्जगुणो ॥ १९२ ॥ उससे दर्शनमोहक्षपकका गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ॥ १९२ ॥ अणंताणुबंधिविसंजोएंतस्स गुणसेडिकालो संखेज्जगुणो ॥ १९३ ॥ उससे अनन्तानुबन्धीके विसंयोजकका गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ॥ १९३ ॥ अधापवत्तसंजदस्स गुणसेडिकालो संखेज्जगुणो ॥ १९४॥ उससे अधःप्रवृत्तसंयतका गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ॥ १९४ ॥ संजदासंजदस्स गुणसेडिकालो संखेज्जगुणो ॥ १९५ ॥ उससे संयतासंयतका गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ॥ १९५ ॥ दंसणमोहउवसामयस्स गुणसेडिकालो संखेज्जगुणो ॥ १९६ ॥ उससे दर्शनमोहोपशामकका गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ॥ १९६ ॥ । प्रथम चूलिका समाप्त हुई ॥ २. वेयणभावविहाणे विदिय - चूलिया एत्तो अणुभागबंधज्झवसाणट्ठाणपरूवणदाए तत्थ इमाणि बारस अणियोगदाराणि ॥ १९७ ॥ यहां अनुभागबन्धाध्यवसानस्थानोंकी प्ररूपणामें ये बारह अनुयोगद्वार हैं ॥ १९७ ।। 'अनुभागबन्धाध्यवसान' से यहां कार्यमें कारणका उपचार करके अनुभागस्थानोंको ग्रहण करना चाहिये। अविभागपडिच्छेदपरूवणा हाणपरूवणा अंतरपरूवणा कंदयपरूवणा ओज-जुम्मपरूवणा छट्ठाणपरूवणा हेदृ हाणपरूवणा समयपरूवणा वढिपत्रणा जवमज्झपरूत्रणा पज्जवसाणपरूवणा अप्पाबहुए त्ति ॥ १९८ ॥ ___ अविभागप्रतिच्छेदप्ररूपणा, स्थानप्ररूपणा; अन्तरप्ररूपणा, काण्डकप्ररूपणा, ओजयुग्मप्ररूपणा, षटस्थानप्ररूपणा; अधस्तनस्थानप्ररूपणा, समयप्ररूपणा; वृद्धिप्ररूपणा, यवमध्यप्ररूपणा, पर्यवसानप्ररूपणा और अल्पबहुत्व ॥ १९८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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