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________________ ४, २, ७, १७७ ] वेयणमहाहियारे वेयणभावविहाणे पढमाचूलिया [६२७ नीचागोदमणंतगुणं ॥ १६७ ॥ अजसकित्ती अणंतगुणा ॥ १६८ ॥ असादावेदणीयमणंतगुणं ॥१६९।। जसकित्ती उच्चागोदं च दो वि तुल्लाणि अणंतगुणाणि ॥१७॥ सादावेदणीयमणंतगुणं ॥१७१॥ णिरयाउअमणंतगुणं ॥१७२॥ देवाउअमणंतगुणं ॥१७३॥ आहारसरीरमणंतगुणं ॥ १७४ ॥ देवगतिसे नीचगोत्र अनन्तगुणा है ॥ १६७ ॥ उससे अयशःकीर्ति अनन्तगुणी है ॥ १६८ ॥ उससे असातावेदनीय अनन्तगुणी है ॥ १६९ ॥ उससे यशःकीर्ति और उच्चगोत्र दोनों ही तुल्य होती हुई अनन्तगुणी हैं ॥ १७० ।। उनसे सातावेदनीय अनन्तगुणी है ।। १७१ ॥ उससे नारकायु अनन्तगुणी है ।। १७२ ॥ उससे देवायु अनन्तगुणी है ॥ १७३ ॥ उससे आहारशरीर अनन्तगुणा है ॥ १७४ ॥ चौंसठ पदवाला जघन्य महादण्डक समाप्त हुआ | १. वेयणभावविहाण पढमा- चूलिया सम्मत्तुप्पत्ती वि य सावय-विरदे अणंतकम्मसे । दंसणमोहक्खवए कसायउवसामए य उवसंते ।। ७ ॥ खवए य खीणमोहे जिणे य णियमा भवे असंखेज्जा । तन्निवरीदो कालो संखेज्जगुणा य सेडीओ ॥८॥ सम्यक्त्वोत्पत्ति अर्थात् सातिशय मिथ्यादृष्टि श्रावक अर्थात् देशव्रती, विरत अर्थात् महाव्रती, अनन्तानुबन्धी कषायका विसंयोजन करनेवाला, दर्शनमोहकी क्षपणा करनेवाला, चारित्रमोहका उपशम करनेवाला उपशान्तकषाय, क्षपक, क्षीणमोह और स्वस्थान जिन व योगनिरोधमें प्रवृत्त जिन; इन स्थानोंमें उत्तरोत्तर असंख्यातगुणी निर्जरा होती है। परन्तु निर्जराका काल उससे विपरीत ( उत्तरोत्तर संख्यातगुणा हीन ) है ॥ ७-८ ॥ अब इन दो गाथाओं द्वारा प्ररूपित ग्यारह गुणश्रेणियोंका स्पष्टीकरण आगेके २२ (१७५-९६) सूत्रों द्वारा किया जाता है-- सव्वत्थोवो दंसणमोहउवसामयस्स गुणसेडिगुणो ॥ १७५ ॥ दर्शनमोहका उपशम करनेवालेका गुणश्रेणिगुणाकार सबसे स्तोक है ॥ १७५ ॥ संजदासंजदस्स गुणसेडिगुणो असंखेज्जगुणो ॥ १७६ ॥ उससे संयतासंयतका गुणश्रेणिगुणाकार असंख्यातगुणा है ॥ १७६ ॥ अधापवत्तसंजदस्स गुणसेडिगुणो असंखेज्जगुणो ।। १७७ ॥ उससे अधःप्रवृत्तसंयत (स्वस्थानसंयत) का गुणश्रेणिगुणाकार असंख्यातगुणा है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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