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________________ ६०] छक्खंडागम परिणामको आदेशभव कहते हैं। भुज्यमान आयु गलकर नई आयुका उदय होनेपर प्रथम समयमें उत्पन्न हुए जीवके परिणामको या पूर्व शरीरका परित्यागकर नवीन शरीरके धारण करनेको भवग्रहण भव कहते हैं । यह भव आयुकर्मके द्वारा धारण किया जाता है, अतः आयुकर्म भवधारणीय कहलाता है। १९. पुद्गलात्त या पुद्गलात्म-अनुयोगद्वार- इसमें बतलाया गया है कि जीव ग्रहणसे, परिणामसे, उपभोगसे, आहारसे, ममत्त्वसे और परिग्रहसे पुद्गलोंको आत्मसात् करता है। अर्थात् हस्त-पाद आदिसे ग्रहण किये गये दण्ड-छत्रादिरूप पुद्गल ग्रहणसे आत्तपुद्गल हैं। मिथ्यात्व आदि परिणामोंसे आत्मसात् किये गये पुद्गल परिणामसे आत्तपुद्गल हैं। उपभोगसे अपनाये गये गन्ध-ताम्बूल आदि पुद्गल उपभोगसे आत्तपुद्गल हैं । खान-पानके द्वारा अपनाये गये पुद्गल आहारसे आत्तपुद्गल हैं। अनुरागसे ग्रहण किये गये पुद्गल ममत्त्वसे आत्तपुद्गल हैं। और अपने अधीन किये गये पुद्गल परिग्रहसे आत्तपुद्गल हैं। इन सबका विस्तारसे वर्णन इस अनुयोगद्वारमें किया गया है । अथवा पुद्गलात्त का अर्थ पुद्गलात्मा भी होता है । कर्मवर्गणारूप पुद्गलके सम्बन्धसे कथंचित, पुद्गलत्व या मूर्त्तत्त्वको प्राप्त हुए संसारी जीवोंका वर्णन इस अनुयोगद्वारमें किया गया है। २०. निधत्त-अनिधत्त-अनुयोगद्वार- इसमें प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशोंकी निधत्त और अनिधत्तरूप अवस्थाका प्रतिपादन किया है। जिस प्रदेशाग्रका उत्कर्षण और अपकर्षण तो होता है, किन्तु उदीरणा और अन्य प्रकृतिरूपसे संक्रमण नही होता, उसकी निधत्तसंज्ञा है। इससे विपरीत लक्षणवाले प्रदेशाग्रोंकी अनिधत्तसंज्ञा है। इस विषयमें यह अर्थपद है कि दर्शनमोहकी उपशामना या क्षपणा करते समय अनिवृत्तिकरणके कालमें केवल दर्शनमोहनीयकर्म अनिधत्त हो जाता है। अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करते समय अनिवृत्तिकरणके कालमें अनन्तानुबन्धी कषायचतुष्क अनिधत्त हो जाता है । इसी प्रकार चारित्रमोहकी उपशामना और क्षपणा करते समय अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें सब कर्म अनिधत्त हो जाते हैं। ऊपर निर्दिष्ट अपने-अपने स्थानके पूर्व दर्शनमोह, अनन्तानुबन्धी चतुष्क और शेष सब कर्म निधत्त और अनिधत्त दोनों प्रकारके होते हैं। २१. निकाचित-अनिकाचित-अनुयोगद्वार- इसमें प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशोंकी निकाचित और अनिकाचित अवस्थाओंका वर्णन किया गया है। जिस प्रदेशाग्रका उत्कर्षण, अपकर्षण, संक्रमण और उदीरणा न की जा सके उसे निकाचित कहते हैं और इससे विपरीत स्वभाववाले प्रदेशानोंको अनिकाचित कहते हैं । इस विषयमें यह अर्थपद है कि अनिवृत्तिकरणमें प्रवेश करनेपर सब कर्म अनिकाचित हो जाते हैं। किन्तु उसके पहले वे निकाचित और अनिकाचित दोनों प्रकारके होते हैं । Jain Education International For Private' & Personal Use Only www.jainelibrary.org .
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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