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________________ ६०४ ] छक्खंडागमे वेयणाखंडं [४, २, ६, २०० एगजीव-दुगुणवड्ढि-हाणिट्ठाणंतरमसंखेज्जाणि पलिदोवमवग्गमूलाणि ॥ २० ॥ एकजीवदुगुणवृद्धि-हानिस्थानान्तर पल्योपमके असंख्यात वर्गमूल प्रमाण हैं । णाणाजीव-दुगुणवड्ढि-हाणिट्ठाणंतराणि पलिदोवमवग्गमूलस्स असंखेजदिभागो॥ नानाजीव दुगुणवृद्धि-हानिस्थानान्तर पल्योपमके वर्गमूलके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं ॥ २०१॥ णाणाजीवदुगुणवड्ढि-हाणिट्ठाणंतराणि थोवाणि ।। २०२ ॥ नानाजीवदुगुणवृद्धि-हानिस्थानान्तर स्तोक हैं ॥ २०२ ॥ एगजीवदुगुणवड्ढि-हाणिहाणंतरमसंखेज्जगुणं ॥ २०३ ॥ एकजीवदुगुणवृद्धि-हानिस्थानान्तर असंख्यातगुणा है ॥ २०३ ॥ सादस्स असादस्स य विट्ठाणयम्मि णियमा अणागारपाओग्गट्ठाणाणि ॥२०४॥ साता व असाता वेदनीयके विस्थानिक अनुभागमें निश्चयसे अनाकार उपयोग योग्य स्थान होते हैं ॥ २०४ ॥ सागारपाओग्गट्ठाणाणि सव्वत्थ ॥ २०५॥ साकार उपयोगके योग्य स्थान सर्वत्र हैं ॥ २०५॥ सादस्स चउट्ठाणियजवमज्झस्स हेट्टदो हाणाणि थोवाणि ॥ २०६॥ सातावेदनीयके चतुःस्थानिक यवमध्यके नीचेके स्थान स्तोक हैं ॥ २०६॥ उवरि संखेज्जगुणाणि ॥ २०७॥ उनसे यवमध्यसे उपरिम स्थितिबन्धस्थान संख्यातगुणे हैं ॥ २०७ ॥ सादस्स तिहाणियजवमज्झस्स हेट्ठदो द्वाणाणि संखेज्जगुणाणि ॥ २०८ ॥ उनसे साता वेदनीयके त्रिस्थानिक यवमध्यके नीचेके स्थान असंख्यातगुणे हैं ॥२०८॥ उवरिसंखेज्जगुणाणि ॥ २०९ ॥ उनसे यवमध्यके उपरिम स्थान संख्यातगुणे है ॥ २०९॥ सादस्स बिट्ठाणियजवमज्झस्स हेढदो एयंतसागारपाओग्गट्ठाणाणि संखेज्जगुणाणि ॥ २१० ॥ उनसे साता वेदनीयके द्विस्थानिक यवमध्यके नीचेके एकान्तत साकार उपयोगके योग्य स्थान संख्यातगुणे हैं ॥ २१० ॥ मिस्सयाणि संखेज्जगुणाणि ॥ २११॥ उनसे मिश्र स्थितिबन्धस्थान संख्यातगुणे है ॥ २११ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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