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________________ ५६६ ] वेयणमहाहियारे वेयणदव्वविहाणे चूलिया [४, २, ४, २१३ ...दोसु वि पासेसु सत्तसमइयाणि जोगट्ठाणाणि दो वि तुल्लाणि असंखेज्जगुणाणि ॥ दोनों ही पार्श्वभागोंमें सात समय योग्य योगस्थान दोनोंही तुल्य व उनसे असंख्यातगुणें हैं ॥ २०७॥ दोसु वि पासेसु छसमइयाणि जोगट्ठाणाणि दो वि तुल्लाणि असंखेज्जगुणाणि ॥ दोनों ही पार्श्वभागोंमें छह समय योग्य योगस्थान दोनों ही तुल्य व उनसे असंख्यातगुणे हैं ॥ २०८ ॥ दोसु वि पासेसु पंचसमइयाणि जोगट्ठाणाणि वि तुल्लाणि असंखेज्जगुणाणि ॥ दोनों ही पार्श्वभागोंमें पांच समय योग्य योगस्थान दोनों ही तुल्य व उनसे असंख्यातगुणे हैं ॥ २०९॥ दोसु वि पासेसु चदुसमइयाणि जोगट्ठाणाणि दो वि तुल्लाणि असंखेज्जगुणाणि ।। दोनों ही पार्श्वभागोंमें चार समय योग्य योगस्थान दोनों ही तुल्य व उनसे असंख्यातगुणे हैं ॥ २१०॥ .. उवरि तिसमइयाणि जोगट्ठाणाणि असंखेज्जगुणाणि ।। २११ ॥ उनसे तीन समय योग्य उपरिम योगस्थान असंख्यातगुणे हैं ॥ २११ ॥ बिससमइयाणि जोगट्ठाणाणि असंखेज्जगुणाणि ॥ २१२ ॥ उनसे दो समय योग्य योगस्थान असंख्यातगुणे हैं ॥ २१२ ॥ जाणि चेव जोगट्ठाणाणि ताणि चेव पदेसबंधट्ठाणाणि । णवरि पदेसबंधट्ठाणाणि पयडिविसेसेण विसेसाहियाणि ॥ २१३ ॥ जो योगस्थान हैं वे ही प्रदेशबन्धस्थान हैं। विशेष इतना है कि प्रदेशबन्धस्थान प्रकृतिविशेषसे विशेष अधिक हैं ॥ २१३ ॥ ॥ वेदना-द्रव्यविधान अनुयोगद्वार समाप्त हुआ ॥ ४ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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