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________________ ५५४ ] वेयणमहाहियारे वेयणदव्वविहाणे सामित्तं [४, २, ४, १०२ मिच्छत्तेण कालगदसमाणो दसवाससहस्साउडिदिएमु देवेसु उववण्णो ॥ ९४ ॥ तत्पश्चात् जो उस मिथ्यात्वके साथ मृत्युको प्राप्त होकर दस हजार वर्षकी आयुवाले देवोंमें उत्पन्न हुआ है ॥ ९४ ॥ अंतोमुहुत्तेण सव्वलहुं सव्वाहि पज्जत्तीहि पज्जत्तयदो ॥ ९५ ॥ वहां जो अन्तर्मुहूर्तमें सर्वलघु कालमें सब पर्याप्तियोंसे पर्याप्त हुआ है ॥ ९५ ॥ अंतोमुहुत्तेण सम्मत्तं पडिवण्णो ॥९६॥ इस प्रकारसे पर्याप्त होकर जो अन्तर्मुहूर्तमें सम्यक्त्वको प्राप्त हो चुका है ॥ ९६ ॥ तत्थ य भवद्विदि दसवाससहस्साणि देसूणाणि सम्मत्तमणुपालइत्ता थोवावसेसे जीवदव्यए ति मिच्छत्तं गदो ॥ ९७ ॥ वहां कुछ कम दस हजार वर्ष प्रमाण भवस्थिति तक उस सम्यक्त्वका पालन करके जो जीवितके थोड़ा शेष रह जानेपर मिथ्यात्वको प्राप्त हो गया है ॥ ९७ ॥ मिच्छत्तेण कालगदसमाणो बादरपुढविजीवपज्जत्तएसु उववण्णो ॥९८॥ उस मिथ्यात्वके साथ कालको प्राप्त होकर जो बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीवोंमें उत्पन्न हुआ है । ९८ ॥ अंतोमुहुत्तेण सव्वलहुं सव्वाहि पज्जत्तीहि पज्जत्तयदो ।। ९९ ॥ वहां जो अन्तर्मुहूर्त द्वारा सर्वलघु कालमें सब पर्याप्तियोंसे पर्याप्त हुआ है ॥ ९९ ॥ अंतोमुहुत्तेण कालगदसमाणो सुहुमणिगोदजीवपज्जत्तएसु उववण्णो ॥ १० ॥ वहां अन्तर्मुहूर्तमें मृत्युको प्राप्त होकर जो सूक्ष्म निगोद पर्याप्त जीवोंमें उत्पन्न हुआ है। पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागमेत्तेहि द्विदिखंडयघादेहि पलिदोवमस्स असंखेज्जदिमागमेत्तेण कालेण कम्मं हदसमुप्पत्तियं कादूण पुणरवि बादर पुढविजीवपज्जत्तएसु उववण्णो ॥ १०१॥ पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र स्थितिकाण्डकघातोंद्वारा पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र कालमें कर्मको हतसमुत्पत्तिक करके जो फिरसे भी बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीवोंमें उत्पन्न हुआ है ॥ १०१ ॥ एवं णाणाभवग्गहणेहि अट्ठ संजमकंडयाणि अणुपालइत्ता चदुक्खुत्तो कसाए उवसामइत्ता पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागमेत्ताणि संजमासंजमकंडयाणि सम्मत्तकंडयाणि च अणुपालइत्ता, एवं संसरीदूग अपच्छिमे भवग्गहणे पुणरवि पुनकोडाउएसु मणुस्सेसु उपवण्णो ॥१०२॥ इस प्रकार नाना भवग्रहणोंमें आठ संयमकाण्डकोंका पालन करके, चार बार कषायोंको Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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