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________________ ५१४] छक्खंडागमे वेयणाखंड [४, १, ११ जानते हैं । जघन्यके ऊपर और उत्कृष्टके नीचे सब मध्यम विकल्प समझने चाहिये । उन ऋजुमतिमनःपर्ययज्ञानी जिनोंको नमस्कार हो। णमो विउलमदीणं ॥११॥ . विपुलमति-मनःपर्ययज्ञानी जिनोंको नमस्कार हो ॥ ११ ॥ विपुल शब्दका अर्थ विस्तृत होता है। इससे यह अभिप्राय हुआ कि जो सरलता, कुटिलता और उभय स्वरूपसे भी दूसरेके मनोगत, वचनगत एवं कायगत पदार्थको जानते हैं वे विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानी कहलाते हैं। वे द्रव्यकी अपेक्षा जघन्यसे एक समयरूप इन्द्रियनिर्जराको तथा उत्कर्षसे मनोद्रव्यवर्गणाके अनन्तवें भागको जानते हैं। क्षेत्रकी अपेक्षा वे जघन्यसे योजनपृथक्त्वरूप क्षेत्रके भीतर तथा उत्कर्षसे घनफलरूप पैंतालीस लाख योजनप्रमाण मनुष्य क्षेत्रके भीतर स्थित वस्तुको जानते हैं। कालकी अपेक्षा वे जघन्यसे सात-आठ भवोंको तथा उत्कर्षसे असंख्यात भवोंको जानते हैं । भावकी अपेक्षा वे अपने विषयभूत द्रव्यकी असंख्यात पर्यायोंको जानते हैं । इस प्रकारके विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानी जिनोंको नमस्कार हो । णमो दसपुब्बियाणं ॥ १२ ॥ दशपूर्वी जिनोंको नमस्कार हो ॥ १२ ॥ ये दशपूर्वी भिन्न और अभिन्नके भेदसे दो प्रकारके हैं। उनमें ग्यारह अंगोंको पढ़कर तत्पश्चात् परिकर्म, सूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत और चूलिका; इन पांच अधिकारोंमें विभक्त दृष्टिवादके पढ़ते समय उत्पादपूर्व आदिके क्रमसे दसवें विद्यानुप्रवादपूर्वके समाप्त होनेपर जब तथा सात सौ क्षुद्र विद्यायें सिद्ध होकर 'भगवन्, क्या आज्ञा देते हैं ?' ऐसा कहती हुई उपस्थित होती हैं तब जो उन सब विद्याओंके लोभको प्राप्त होता है वह भिन्नदशपूर्वी कहा जाता है। किन्तु जो कर्मक्षयका अभिलाषी होनेसे उनके विषयमें जो लोभको नहीं प्राप्त होता है वह अभिन्नदशपूर्वी कहलाता है । उनमें यहां अभिन्नदशपूर्वी जिनोंको नमस्कार किया गया है । णमो चोदसपुब्बियाणं ॥ १३ ॥ चौदहपूर्वी श्रुतकेवली जिनोंको नमस्कार हो ॥ १३ ॥ णमो अटुंगमहाणिमित्तकुसलाणं ॥ १४ ॥ अष्टांग महानिमित्तोंमें कुशलताको प्राप्त हुए जिनोंको नमस्कार हो ॥ १४ ॥ वे अष्टांगनिमित्त ये हैं- अंग, स्वर, व्यञ्जन, लक्षण, छिन्न, भौम, स्वप्न और अन्तरिक्ष । १. मनुष्य और तिर्यंचोंके अंग-प्रत्यंगोंके साथ उनकी वात-पित्तादि प्रकृति, सात धातुओं और वर्ण-रसादिको देखकर तीनों कालोसम्बन्धी सुख-दुःखादिको जान लेना; यह अंग महानिमित्त कहलाता है। २. मनुष्य और तिर्यंचोंके अनेक प्रकारके शब्दोंको सुनकर तीनों कालों सम्बन्धी सुख-दुःखादिको जान लेने का नाम स्वर महानिमित्त है। ३. शिर, मुख एवं कन्धे Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org :
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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