________________
४८६ ] छक्खंडागमे बंध-सामित्त-विचओ
[३, १२९ देवाउअस्स को बंधो को अबंधो? ॥ १२९ ॥ देवायुका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ॥ १२९ ॥
मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी असंजदसम्माइट्ठी संजदासंजदा पमत्तसंजदा अप्पमत्तसंजदा बंधा । अप्पमत्तद्धाए संखेज्जदिमं भागं गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ १३० ॥
__मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत्त और अप्रमत्तसंयत बन्धक हैं । अप्रमत्तकालके संख्यातवें भाग जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है। ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ १३० ॥
देवगइ-पंचिंदियजादि उब्विय -तेजा-कम्मइयसरीर-समचउरससंठाण - वेउब्धियसरीरअंगोवंग-वण्ण -गंध-रस - फास -देवगइप्पाओग्गाणुपुची-अगुरुवलहुव-उवघाद-परघादउस्सास - पसत्थविहायगइ - तस - बादर-पज्जत्त - पत्तेयसरीर-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज्जणिमिणणामाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ १३१ ॥
देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, वैक्रियिक, तैजस व कार्मण शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय और निर्माण नामकर्म; इनका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ १३१ ॥
मिच्छाइटिप्पहुडि जाव अपुव्वकरण-पइट-उवसमा खवा बंधा । अपुव्वकरणद्धाए संखेज्जे भागे गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ १३२ ॥
मिथ्यादृष्टिसे लेकर अपूर्वकरणप्रविष्ट उपशमक व क्षपक तक बन्धक हैं। अपूर्वकरणकालके संख्यात बहुभाग जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥१३२॥
' आहारसरीर-आहारअंगोवंगणामाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ १३३ ॥
आहारकशरीर और आहारकशरीरांगोपांग नामकोका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ १३३ ॥.. . .
__अप्पमत्तसंजदा अपुल्वकरण-पइट्ठ-उवसमा खवा बंधा । अपुव्वकरणद्धाए संखेज्जे भागे गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥१३४ ।।
अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणप्रविष्ट उपशमक व क्षपक बन्धक हैं। अपूर्वकरणकालके संख्यात बहुभाग जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है। ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ।। १३४ ॥
तित्थयरणामाए को बंधो को अबंधो? ॥ १३५ ।। तीर्थंकर नामकर्मका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ १३५ ॥
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org