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४८२ ] छक्खंडागमे बंध-सामित्त-विचओ
[ ३, ९७ मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी असंजदसम्माइट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ।
मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं। ये बन्धक हैं, शेषअबन्धक हैं ॥ ९७ ॥ ....
तित्थयरणामकम्मस्स को बंधो को अबंधो ? ॥ ९८ ॥ तीर्थंकर नामकर्मका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ ९८ ॥ असंजदसम्मादिट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ ९९ ॥ असंयतसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ।। ९९ ॥
अणुदिस जाव सब्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवेसु पंचणाणावरणीय-छदंसणावरणीयसादासाद-बारसकषाय-पुरिसवेद-हस्स-रदि-अरदि-सोग-भय - दुगुंछा-मणुस्साउ-मणुसगइ-पंचिंदियजादि-ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीर-समचउरससंठाण-ओरालियसरीरअंगोवंग-वज्जरिसहसंघडण-चण्ण-गंध-रस-फास-मणुसगइपाओग्गाणुपुची-अगुरुअलहुअ-उवधाद-परघाद - उस्सासपसत्थविहायगइ-तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिराथिर-सुहासुह-सुभग-सुस्सर - आदेज्ज-जसकित्ति-अजसकित्ति-णिमिण-तित्थयर-उच्चागोद-पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंधो? ॥१०॥
अनुदिशोंसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तक विमानवासी देवोंमें पांच ज्ञानावरणीय, छह दर्शनावर, णीय, साता व असाता वेदनीय, बारह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सामनुष्यायु, मनुष्यगति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक, तैजस व कार्मण शरीर, समचतुरस्रसंस्थान,
औदारिकशरीरांगोपांग, वज्रर्षभसंहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, अयशःकीर्ति, निर्माण, तीर्थंकर, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ १०० ॥
असंजदसम्मादिट्ठी बंधा, अबंधा णत्थि ॥१०१॥ असंयतसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं । ॥ १०१॥
इंदियाणुवादेण एइंदिया बादरा सुहुमा पज्जत्ता अपज्जत्ता बीइंदिय-तीइंदियचरिंदिय-पज्जत्ता अपज्जता पंचिंदियअपज्जत्ताणं पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्तभंगो ॥१०२॥
___ इन्द्रियमार्गणाके अनुसार एकेन्द्रिय, बादर एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय तथा इनके पर्याप्त व अपर्याप्त; द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा इनके पर्याप्त व अपर्याप्त, और पंचेन्द्रिय अपर्याप्त; इनकी प्ररूपणा पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तोंके समान है ॥ १०२ ॥
पंचिंदिय -पंचिंदियपज्जत्तएसु पंचणाणावरणीय - चउदंसणावरणीय - जसकित्तिउच्चागोद-पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ १०३ ॥
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