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________________ ४६६ ] छक्खंडागमे बंध - सामित्त-विचओ [ ३, ४ संयत, अप्रमत्तसंयत, अपूर्वकरणप्रविष्ट उपशमक व क्षपक, अनिवृत्ति- बादर-साम्परायिक- प्रविष्ट उपशमक व क्षपक, सूक्ष्म-साम्परायिक- प्रविष्ट उपशमक व क्षपक, उपशान्तकषाय- वीतराग छद्मस्थ, क्षीणकषाय- वीतराग-छद्मस्थ, सयोगिकेवली और अयोगिकेवली; ये वे चौदह जीवसमास हैं ॥ ३ ॥ इस प्रकार चौदह जीवसमासोंके स्वरूपका स्मरण कराकर प्रकृत बन्धस्वामित्वके निरूपणार्थ उत्तर सूत्र कहते हैं एदेसिं चोद्दसहं जीवसमासाणं पयडिबधवोच्छेदो कादव्वो भवदि ॥ ४ ॥ इन चौदह जीवसमासोंसे सम्बन्धित प्रकृतिबन्धव्युच्छेद कहा जाता है ॥ ४ ॥ जिन प्रकृतियोंका जिस गुणस्थान में बन्धव्युच्छेद होता है उसी गुणस्थान तक उनके बन्धक (बन्धस्वामी) हैं, उससे आगे के गुणस्थानोंमें उनका बन्ध नहीं होता है; यह अभिप्राय ग्रहण करना चाहिये । तदनुसार यहां उन्हीं चौदह गुणस्थानोंके आश्रयसे कर्मप्रकृतियोंके बन्धका व्युच्छेद (विनाश ) कहा जाता है । पंच णाणावरणीयाणं चदुण्हं दंसणावरणीयाणं जसकित्ति उच्चागोद-पंचण्हमंतराइयाण को बधो को अबंधो १ ।। ५ ।। पांच ज्ञानावरणीय, चार दर्शनावरणीय, यशः कीर्ति, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इन सोलह प्रकृतियोंका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ ५ ॥ 'बन्ध' शब्दसे यहां बन्धकका ( बन्धस्वामीका ) अभिप्राय ग्रहण करना चाहिये । मिच्छादिट्टि पहुडि जाव सुहुम-सांपराइय-सुद्धिसंजदेसु उवसमा खवा बंधा। सुहुमसां पराइय-सुद्धिसंजद द्धाए चरिमसमयं गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ मिथ्यादृष्टिसे लेकर सूक्ष्म-साम्परायिक शुद्धिसंयत उपशमक व क्षपक तक उपर्युक्त जीव ज्ञानावरणीयादि सोलह प्रकृतियोंके बन्धक हैं । सूक्ष्म- साम्परायिक शुद्धिसंयत के अन्तिम समयमें जाकर उनका बन्ध व्युच्छिन्न होता है । ये बन्धक हैं, शेष जीव अबन्धक हैं ॥ ६ ॥ णिहाणिद्दा - पयलापयला-थीण गिद्धि - अनंताणुबंधिकोह- माण- माया-लोभ- इत्थिवेदतिरिक्खाउ - तिरिक्खगइ - चउसठाण - चउसंघडण तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुव्वि-उज्जोव - अप्पसत्थविहायगइ दुभग- दुस्सर- अणादेज्ज - णीचागोदाणं को बंधो को अबंधो १ ॥ ७ ॥ निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया व लोभ, स्त्रीवेद, तिर्यगायु, तिर्यग्गति, न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान आदि चार संस्थान, वज्रनाराचसंहनन आदि चार संहनन, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और नीचगोत्र; इन पच्चीस प्रकृतियोंका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ ७ ॥ मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ ८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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