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________________ ३५२] छक्खंडागमे खुद्दाबंधो [२, १, ३ अपेक्षा काल, नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर, भागाभागानुगम और अल्पबहुत्वानुगम; ये वे ज्ञातव्य ग्यारह अनुयोगद्वार हैं ॥ २ ॥ एगजीवेण सामित्तं ॥३॥ इनमें प्रथमतः एक जीवकी अपेक्षा स्वामित्वकी प्ररूपणा की जाती है ॥ ३ ॥ गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइओ णाम कधं भवदि ? ॥४॥ गतिमार्गणानुसार नरकगतिमें नारकी जीव किस प्रकारसे होता है ? ॥ ४ ॥ अभिप्राय यह है कि नयविवक्षाभेदसे, निक्षेपकी अपेक्षा और औपशमिकादि भावोंकी अपेक्षा चूंकि नारक शब्दका अर्थ विभिन्न प्रकारका होता है; अत एव उनमें यहां कौन-से नारकका अभिप्राय है, और वह किस प्रकारसे होता है; यह पूछा गया है। णिरयगदिणामाए उदएण ॥५॥ नरकगति नामकर्मके उदयसे जीव नारकी होता है ॥ ५॥ उक्त प्रश्नके उत्तरमें यहां यह सूचित किया गया है कि जीव नयोंमें एवंभूत नयसे, निक्षेपोंमें नोआगमभावनिक्षेपसे तथा भावोंमें नरकगति नामकर्मके उदयसे नारकी होता है । तिरिक्खगदीए तिरिक्खो णाम कधं भवदि ? ॥६॥ तिर्यंच गतिमें तिथंच किस प्रकार होता है ? ॥ ६ ॥ तिरिक्खगदिणामाए उदएण ॥ ७ ॥ तिर्यंचगति नामकर्मके उदयसे जीव तिर्यंच होता है ॥ ७ ॥ मणुसगदीए मणुसो णाम कधं भवदि ? ॥ ८॥ मनुष्यगतिमें जीव मनुष्य कैसे होता है ? ॥ ८ ॥ मणुसगदिणामाए उदएण ॥ ९ ॥ मनुष्यगति नामकर्मके उदयसे जीव मनुष्य होता है ॥ ९ ॥ देवगदीए देवो णाम कधं भवदि ? ॥ १० ॥ देवगतिमें जीव देव कैसे होता है ? ॥ १० ॥ देवगदिणामाए उदएण ॥ ११ ॥ देवगति नामकर्मके उदयसे जीव देव होता है ॥ ११ ॥ सिद्धगदीए सिद्धो णाम कधं भवदि ? ॥ १२ ॥ सिद्धगतिमें जीव सिद्ध कैसे होता है ? ॥ १२ ॥ खइयाए लद्धीए ॥ १३ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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