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३४४] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं
[१, ९-९, २४३ उत्पन्न करते हैं, कोई तीर्थकरत्वको उत्पन्न करते हैं। वे सब ही नियमसे अन्तकृत होकर सिद्ध होते हैं, बुद्ध होते हैं, मुक्त होते हैं, परिनिर्वाणको प्राप्त होते हैं और सर्व दुःखोंके अन्तको प्राप्त होते हैं ।। २४३ ॥
॥ नवमी चूलिका समाप्त हुई ॥ ९॥ इस प्रकार जीवस्थान समाप्त हुआ ॥ १ ॥
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