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________________ १,९-९, २३२] जीवट्ठाण-चूलियाए तिरिक्ख-मणुस्साणं गदिपुव्वं गुणलाहो [३४१ देवगतिमें देव देव पर्यायसहित उद्वर्तित और च्युत होकर कितनी गतियोंमें आते हैं ? ॥ दुवे गदीओ आगच्छंति तिरिक्खगदि मणुसगदि चेदि ॥ २२७ ॥ देवगतिसे च्युत हुए जीव तिर्यंचगति और मनुष्यगति इन दो गतियोंमें आते हैं ॥२२७॥ तिरिक्खेसु उबवण्णल्लया तिरिक्खा केइं छ उप्पाएंति ॥ २२८ ॥ देवगतिसे च्युत होकर तिर्यंचोंमें उत्पन्न हुए कोई तिर्यंच छहको उत्पन्न करते हैं ॥२२८॥ मणुसेसु उववण्णल्लया मणुसा केई सव्वं उप्पाएंति- केइमाभिणिवोहियणाणमुप्पाएंति, केइं सुदणाणमुप्पाएंति, केइमोहिणाणमुप्पाएंति, केई मणपज्जणाणमुप्पाएंति, केई केवलणाणमुप्पाएंति, केइं सम्मामिच्छत्तमुप्पाएंति, केई सम्मत्तमुप्पाएंति, केइं संजमासंजममुप्पाएंति, केई संजमं उप्पाएंति, केई बलदेवत्तमुप्पाएंति, केई वासुदेवत्तमुप्पाएंति, केई चक्कवट्टित्तमुप्पाएंति, केई तित्थयरयत्तमुप्पाएंति, केइमंतयडा होदण सिझंति बुझंति मुच्चंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुक्खाणमंतं परिविजाणंति ॥ २२९॥ देवगतिसे च्युत होकर मनुष्योंमें उत्पन्न हुए मनुष्य कोई सब ही गुणोंको उत्पन्न करते हैं-- कोई आभिनिबोधिकज्ञानको उत्पन्न करते हैं, कोई श्रुतज्ञानको उत्पन्न करते हैं, कोई अवधिज्ञानको उत्पन्न करते हैं, कोई मनःपर्ययज्ञानको उत्पन्न करते हैं, कोई केवलज्ञानको उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यग्मिथ्यात्वको उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं, कोई संयमासंयमको उत्पन्न करते हैं और कोई संयमको उत्पन्न करते हैं, कोई बलदेवत्वको उत्पन्न करते हैं, कोई वासुदेवत्वको उत्पन्न करते हैं, कोई चक्रवर्तित्वको उत्पन्न करते हैं, कोई तीर्थंकरत्वको उत्पन्न करते हैं, और कोई अन्तकृत होकर सिद्ध होते हैं, बुद्ध होते हैं, मुक्त होते हैं, परिनिर्वाणको प्राप्त होते हैं, तथा सर्व दुःखोंके अन्तको प्राप्त होते हैं ॥ २२९ ।। भवणवासिय-वाण-तर-जोदिसियदेवा देवीओ सोधम्मीसाणकप्पवासियदेवीओ च देवा देवेहि उबट्टिद-चुदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ? ॥ २३० ॥ भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देव व उनकी देवियां तथा सौधर्म और ऐशान कल्पवासिनी देवियां; ये देव पर्यायसे उद्वर्तित और च्युत होकर कितनी गतियोंमें आते हैं ? ॥२३०॥ दुवे गदीओ आगच्छंति तिरिक्खगदि मणुसगदि चेव ।। २३१ ॥ उक्त भवनवासी आदि देव और देवियां देवगतिसे च्युत होकर तिर्यंचगति और मनुष्यगति इन दो गतियोंमें आते हैं ॥ २३१ ॥ तिरिक्खेसु उबवण्णल्लया तिरिक्खा केई छ उप्पाएंति ॥ २३२ ।।। उक्त भवनवासी आदि देव-देवियां तिर्यंचोंमें उत्पन्न होकर तिर्यंच पर्यायके साथ कोई आभिनिबोधिकज्ञान आदि छहको उत्पन्न करते हैं ॥ २३२ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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