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________________ १, ९-८, २२० ] जीवाण - चूलियाए रइयाणमागदिपुव्वं गुणपरूवणा [ ३३९ इस क्रियापदका प्रयोग किया गया है। अभिप्राय उसका यह है कि जीव संसार अवस्थामें अनादि कर्मबन्धसे बद्ध होने के कारण कथंचित् बद्ध, मूर्तिक व कथंचित् अनित्य भी है । अत एव वह कर्मोंसे सम्बद्ध भी रहता है। इस प्रकार सिद्ध हो जानेपर वह उस कर्मबन्धनसे छुटकारा पा लेता है । किन्ही तार्किकोंका मत है कि समस्त कर्मबन्धके नष्ट हो जानेपर भी जीव आत्यन्तिक सुखको प्राप्त नहीं होता है, क्योंकि, उस समय उसके सुखका हेतुभूत शुभ कर्म और दुखका हेतुभूत अशुभ कर्म भी नहीं रहता है । इस मतके निराकरणार्थ सूत्र में ' परिणिव्वाणयति' यह पद दिया गया है । अभिप्राय उसका यह है कि जीव कर्मबन्धनसे छूट जानेपर - मुक्त हो जानेपरअनन्त सुखका अनुभव करता है । संसार अवस्थामें शुभ कर्मके निमित्तसे जो सुख प्राप्त होता है वह बाधासहित व विनश्वर होता है । इसीलिये वह वस्तुतः सुख नहीं, किन्तु सुखाभास है । वास्तविक ( निराकुल ) सुख तो शुभ और अशुभ इन दोनों ही कर्मों के अभाव में होता है। अतः सिद्ध अवस्था में जीव अनन्त सुखका शाश्वतिक अनुभव किया करता है । उक्त तार्किकोंका यह भी मत है कि जहां सुख है वहां नियमसे दुख भी रहता है, क्योंकि, वह ( सुख ) दुखका अविनाभावी है- उसके विना नहीं होता है । इस अभिप्रायके निराकरणार्थ यहां सूत्रमें ' सव्वदुक्खाणमंतं परिविजाणंति' यह कहा गया है। उसका अभिप्राय यह है कि मुक्त हो जानेपर जीव सभी दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है। कारण यह कि उस समय उसके उस दुखके हेतुभूत कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है । अत एव उसे उस समय स्वास्थ्य (आत्मस्थिति ) रूप स्वाभाविक शाश्वतिक सुख प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सूत्रमें प्रयुक्त उक्त सब ही पद सार्थक हैं, ऐसा समझना चाहिये । तिसु उवरिमासु पुढवीसु णेरइया णिरयादो णेरड्या उव्वट्टिदसमाणा कदि गदीओ आगच्छति ॥ २१७ ॥ ऊपरकी तीन पृथिवियोंके नारकी जीव नारकी होते हुए नरकसे निकलकर कितनी गतियोंमें आते हैं ? ॥ २१७॥ दुवे गीओ आगच्छति तिरिक्खगदिं मणुसगदिं चैव ॥ २९८ ॥ ऊपरकी तीन पृथिवियोंसे निकलनेवाले नारकी जीव तिर्यंचगति और मनुष्यगति इन दो गतियोंमें आते हैं || २१८ ॥ तिरिक्खेसु उववण्णल्लया तिरिक्खा केई छ उपाएंति ।। २१९ ।। ऊपरकी तीन पृथिवियोंसे निकलकर तिर्यंचोंमें उत्पन्न हुए कोई तिर्यंच आभिनिबोधिज्ञान आदि छहको उत्पन्न करते हैं ॥ २१९ ॥ मणुसे उववण्णल्ला केइमेक्कारस उप्पाएंति- केइमाभिणिबोहियणाणमुप्पा एंति, केई सुदणाणमुप्पाएंति, केइमोहिणाणमुप्पाएंति, केई मणपज्जवणाणमुप्पाएंति, केई केवल Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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