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________________ ३३८ ] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [ १,९-९, २१४ चौथी पृथिवीके नारकी जीव नारकी होते हुए नरकसे निकलकर कितनी गतियाम आते हैं ? ॥ २१३ ॥ दुवे गदीओ आगच्छंति तिरिक्खगई चेव मणुसगई चेव ॥ २१४ ॥ चौथी पृथिवीसे निकलते हुए नारकी जीव तिर्यंचगति और मनुष्यगति इन दो गतियोंमें आते हैं ॥ २१४॥ तिरिक्खेसु उववण्णल्लया तिरिक्खा केई छ उप्पाएंति ॥२१५।। चौथी पृथिवीसे तिर्यंचोंमें उत्पन्न हुए कोई तिर्यंच आभिनिबोधिकज्ञान आदि उक्त छहको उत्पन्न करते हैं ॥ २१५ ॥ मणुसेसु उबवण्णल्लया मणुसा केइं दस उप्पाएंति- केइमाहिणियोहियणाणमुप्पाएंति, केई सुदणाणमुप्पाएंति, केइमोहिणाणमुप्पाएंति, केई मणपज्जवणाणमुप्पाएंति, केई केवलणाणमुप्पाएंति, केई सम्मामिच्छत्तमुप्पाएंति, केई सम्मत्तमुप्पाएंति, केई संजमा संजममुप्पाएंति, केई संजममुप्पाएंति । णो बलदेवत्तं, णो वासुदेवत्तं, णो चक्कवट्टित्तं, णो तित्थयरतं । केइमंतयडा होदण सिझंति बुझंति मुचंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुक्खाणमंतं परिविजाणंति ॥ २१६ ॥ चौथी पृथिवीसे मनुष्योंमें उत्पन्न हुए कोई मनुष्य दसको उत्पन्न करते हैं- कोई आभिनिबोधिकज्ञानको उत्पन्न करते हैं, कोई श्रुतज्ञानको उत्पन्न करते हैं, कोई अवधिज्ञानको उत्पन्न करते हैं, कोई मनःपर्ययज्ञानको उत्पन्न करते हैं, कोई केवलज्ञानको उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यग्मिथ्यात्वको उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं, कोई संयमासंयमको उत्पन्न करते हैं, और कोई संयमको उत्पन्न करते हैं। किन्तु वे न बलदेवत्वको उत्पन्न करते हैं, न वासुदेवत्वको, न चक्रवर्तित्वको और न तीर्थंकरत्वको उत्पन्न करते हैं। कोई अन्तकृत ( आठों कर्मोके विनाशक ) होकर सिद्ध होते हैं, बुद्ध होते हैं, मुक्त होते हैं, परिनिर्वाणको प्राप्त होते हैं, और कोई सर्व दुःखोंके अन्तको प्राप्त होते हैं ॥ २१६ ॥ यहां जो “सिझंति बुझंति ' आदि अनेक क्रियापदोंका प्रयोग किया गया है वह अनेक वादियोंके अभिमतके निराकरणार्थ किया गया है । यथा-कपिल ऋषिका अभिमत है कि केवलज्ञानके उत्पन्न हो जानेपर भी जीव समस्त पदार्थोको नहीं जानता है। इस अभिमतके निराकरणार्थ सूत्रमें 'बुझंति' यह क्रियापद दिया गया है। उसका अभिप्राय है कि जीव सिद्ध होकर तीनों कालोंके विषयभूत अनन्त अर्थ और व्यंजन पर्यायोंसे संयुक्त समस्त पदार्थोका ज्ञाता हो जाता है । वैशेषिक, नैयायिक, सांख्य और मीमांसकोंका कहना है कि मोक्षका अर्थ बन्धनसे छूटन । है, परन्तु जीवके नित्य व अमूर्त होनेसे जब वह बन्ध ही उसके सम्भव नहीं है तब उसके भला मोक्ष किसका होगा-- वह असम्भव ही है। उनके इस अभिमतके निराकरणार्थ यहां सूत्रमें 'मुच्चंति' Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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